अंकों के परे, जीवन की असल पहचान
अंकों के बंधन में क्यों, जीवन को ललचाया जाए?
क्या बच्चे की असली पहचान, केवल अंकों से तय किया जाए?
क्या उसकी आत्मा, उसकी धड़कन, उसकी संवेदनाएँ,
क्या इन सबसे अधिक मूल्यवान नहीं?
हर बच्चा एक फूल है, जो अपने समय में खिलता है,
कभी सूरज की तेज़ धूप में, कभी बरसात की रिमझिम में।
लेकिन हम उसे एक ही रंग, एक ही रूप में क्यों देख रहे हैं?
क्या उसकी विविधता, उसकी असली शक्ति को हम पहचान रहे हैं?
अंकों से नहीं, सपनों से उसे परखो तुम, उसके हौसले से, उसकी रचनात्मकता से, उसकी आँखों के गहरे झीलों से।
उसकी दुनिया को समझो, उसकी बुनियादी इच्छाओं को जानो,
क्या अंक उसे जीवन की असल राह दिखा सकते हैं?
हर बच्चे में छिपा एक आकाश है,
जो उड़ान भरने के लिए तैयार है, पर तुम उसे सीमित करते हो।
क्या उसके आंतरिक आकाश को, तुम एक अंक से समझ सकते हो?
क्या उसकी आंतरिक काबिलियत को, तुम एक संख्या में बांध सकते हो?
यह ज़रूरी नहीं, अंक उसकी पहचान बन जाए,
वह अपनी पहचान खुद बनाए, हर दिन, हर क्षण।
अंकों से परे, उसकी दुनिया में जो रंग हैं,
वो केवल वही समझ सकता है, जो उसे अपनी आँखों से देखे।
प्रियंका सौरभ













