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गाँव पेटवाड़ का लाल : जस्टिस सूर्यकांत की यात्रा देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश तक

News-Desk by News-Desk
November 25, 2025
in देश
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(“पेटवाड़ की मिट्टी से निकला वह दीप, जिसने न्याय के मंदिर में अपने उजाले से पूरे देश को आलोकित कर दिया।”)

हरियाणा के हिसार ज़िले का छोटा-सा गाँव पेटवाड़ आज पूरे देश में प्रेरणा का प्रतीक बन गया है। इसी मिट्टी ने जस्टिस सूर्यकांत जैसे रत्न को जन्म दिया, जो अब भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश बने हैं। उनका जीवन संघर्ष, सादगी, ईमानदारी और अनुशासन की मिसाल है। पिता पंडित मदन गोपाल जी द्वारा दिए गए संस्कार और शिक्षा ने उनके चरित्र को वह ऊँचाई दी, जिसने उन्हें न्याय के सर्वोच्च पद तक पहुँचाया। उनकी सफलता हर उस भारतीय युवा के लिए संदेश है कि सही मार्ग, मेहनत और मूल्यों के साथ कोई भी शिखर अजेय नहीं।

– डॉ प्रियंका सौरभ

मेरे पति डॉ. सत्यवान सौरभ के साहित्यिक गुरु पंडित मदन गोपाल जी अब इस भौतिक संसार में नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे सैकड़ों पत्र आज भी हमारे पास सुरक्षित हैं। वे पत्र सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि जीवन का ज्ञान, संवेदना और आत्मा की सच्ची आवाज़ थे। हर सप्ताह वे प्रेम से पत्र लिखते, साहित्य की बारीकियाँ सिखाते और जीवन में ईमानदारी तथा कर्म की महत्ता समझाते थे। उनके प्रत्येक पत्र में विचारों की ऊँचाई, भाषा की सादगी और चरित्र की गरिमा बसती थी।

आज जब उनके छोटे पुत्र सूर्यकांत जी देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश बने हैं, तो लगता है कि उनके संस्कारों ने ही परिवार को इस ऊँचाई तक पहुँचाया। यह केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि गुरु के मूल्यों और भारतीय परंपरा में रचे-बसे ज्ञान-संस्कारों की विजय है।

हरियाणा के हिसार ज़िले का छोटा-सा गाँव पेटवाड़ अब पूरे देश में प्रेरणा का प्रतीक बन खड़ा हुआ है। इसी गाँव की मिट्टी ने वह रत्न दिया जिसने मेहनत, सादगी, ईमानदारी और निष्ठा के बल पर वकालत से लेकर देश की सर्वोच्च न्यायिक कुर्सी तक की यात्रा तय की — जस्टिस सूर्यकांत।

चार भाई-बहनों (कमला देवी, ऋषिकांत, देवकांत, शिवकांत, सूर्यकांत) में सबसे छोटे सूर्यकांत ने बचपन से ही अध्ययन, संयम और परिश्रम को जीवन का आधार बनाया। उनके पिता पंडित मदन गोपाल जी साहित्यप्रेमी और नैतिक मूल्यों से भरे व्यक्ति थे, जिन्हें लोगों को सही राह दिखाने में आनंद आता था। यही संस्कार सूर्यकांत जी के जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बने।

गाँव की सादगी, खेतों की मिट्टी की खुशबू और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयाँ उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाती रहीं। सीमित साधनों के बावजूद उनके भीतर शिक्षा और कर्मनिष्ठा के प्रति अटूट विश्वास था।

1984 में उन्होंने वकालत के क्षेत्र में कदम रखा। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में उन्होंने न सिर्फ महत्वपूर्ण मामलों को संभाला बल्कि गरीबों और वंचितों के अधिकारों के लिए आवाज़ बनकर उभरे। उनकी पहचान एक संजीदा, निष्पक्ष और संवेदनशील अधिवक्ता की बनी।

बाद में जब वे न्यायिक सेवा में आए, तो उन्होंने न्यायालय को केवल फैसले देने की व्यवस्था नहीं माना, बल्कि मानवीय मूल्यों का मंदिर समझा। उनका हर निर्णय न्याय और संवेदना के संतुलन का प्रतिरूप रहा।

2019 में वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। उस दिन हरियाणा, विशेषकर पेटवाड़, गर्व से भर उठा। और आज जब वे भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश बने हैं, तो गाँव के हर आँगन में दीये जल रहे हैं, बुज़ुर्गों की आँखें नम हैं और युवा प्रेरित हो रहे हैं।

पंडित मदन गोपाल जी भले आज नहीं हैं, लेकिन उनके संस्कार आज भी परिवार में दीपक की तरह उजाले फैला रहे हैं। वही संस्कार सूर्यकांत जी के जीवन की दिशा बने — सत्य, ईमान और न्याय का मार्ग।

जस्टिस सूर्यकांत की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं है। यह उस विश्वास की जीत है कि भारत का कोई भी नौजवान, चाहे वह किसी छोटे-से गाँव से ही क्यों न हो, अगर उसके भीतर लगन, नैतिकता और अनुशासन है तो वह किसी भी शिखर तक पहुँच सकता है।

वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे। समय मिलते ही गाँव आते, बुज़ुर्गों को प्रणाम करते और बच्चों को पढ़ाई की प्रेरणा देते। उनका मानना था — “शिक्षा वह शक्ति है जो अंधकार को प्रकाश में बदल देती है।” उनकी यह सोच अब पूरे क्षेत्र में युवाओं को दिशा दे रही है।

आज जब वे सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुँचे हैं, तो वे सिर्फ पेटवाड़ के बेटे नहीं, बल्कि हर भारतीय के प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। उनके निर्णय, उनकी विनम्रता और उनका सहज स्वभाव उन्हें न्यायपालिका का वह चेहरा बनाते हैं जो कानून को सिर्फ धारा नहीं, बल्कि संवेदना के साथ देखता है।

जस्टिस सूर्यकांत की यात्रा हमें यह सिखाती है कि सच्ची सफलता वही है जो समाज को प्रेरित करे, आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाए और चरित्र को ऊँचा उठाए।

पेटवाड़ के एक छोटे से घर से लेकर सुप्रीम कोर्ट के विशाल भवन तक की यह यात्रा इसी सच का प्रमाण है कि जो व्यक्ति अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं करता, उसके लिए रास्ते स्वयं बनते चले जाते हैं।

आज उनका उदय उस “नए भारत” का प्रतीक है जहाँ न्यायपालिका न केवल कानून की संरक्षक है बल्कि सामाजिक न्याय की आत्मा भी।

डॉ. प्रियंका सौरभ

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