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खेलों में भारतीय बेटियों का खुशनुमा दौर: जब बेटियाँ बनीं देश का गौरव

News-Desk by News-Desk
November 29, 2025
in देश
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खेलों में भारतीय बेटियों का खुशनुमा दौर: जब बेटियाँ बनीं देश का गौरव




डॉ विजय गर्ग 

खबरें हटके

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हाल के वर्षों में भारतीय खेलों के परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है, और इस बदलाव की मुख्य नायक हैं भारत की बेटियाँ। आज, हरमनप्रीत कौर और शेफाली वर्मा से लेकर पीवी सिंधु, मीराबाई चानू, और लवलीना बोरगोहेन तक, महिला एथलीटों ने न केवल अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराया है, बल्कि लाखों युवा लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनी हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारतीय खेल एक “खुशनुमा दौर” से गुजर रहे हैं, जिसकी चमक महिला खिलाड़ियों की अभूतपूर्व सफलता से और भी बढ़ गई है।

 उपलब्धियों का नया अध्याय

भारतीय बेटियों ने लगभग हर खेल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है:

क्रिकेट: भारतीय महिला क्रिकेट टीम की हालिया सफलता, जिसमें वर्ल्ड कप जैसे बड़े खिताब शामिल हैं (जैसे कि 2025 में वनडे और टी-20 वर्ल्ड कप जीतना), महिला क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर ले गई है। इन जीतों ने देश में महिला क्रिकेट के प्रति एक नया जुनून पैदा किया है।

ओलंपिक और वैश्विक मंच: कर्णम मल्लेश्वरी के सिडनी 2000 ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के साथ शुरू हुआ सफर अब एक मजबूत धारा बन चुका है। पीवी सिंधु (बैडमिंटन), मैरी कॉम (बॉक्सिंग), साक्षी मलिक (कुश्ती), और मीराबाई चानू (भारोत्तोलन) ने लगातार ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतकर यह साबित किया है कि भारतीय महिलाएँ विश्व स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

अन्य खेल: कबड्डी, हॉकी, शूटिंग और एथलेटिक्स जैसे खेलों में भी महिला टीमों और व्यक्तिगत खिलाड़ियों (जैसे रानी रामपाल की कप्तानी में हॉकी टीम या हिमा दास) का प्रदर्शन सराहनीय रहा है।

 चुनौतियों से मिली ताकत

यह खुशनुमा दौर यूँ ही नहीं आया। इन महिला खिलाड़ियों में से अधिकांश ने गरीबी, सामाजिक रूढ़ियों और लैंगिक भेदभाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना किया है। छोटे शहरों और ग्रामीण परिवेश से निकलकर, जहाँ खेल को अक्सर लड़कियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था, वहाँ से शीर्ष पर पहुँचना उनके अटूट हौसले, इच्छाशक्ति और कठोर परिश्रम का परिणाम है।

प्रेरणादायक कहानियाँ: मैरी कॉम का मुक्केबाजी के लिए संघर्ष, हिमा दास का धान के खेतों से निकलकर ट्रैक पर धूम मचाना, और कई अन्य खिलाड़ियों की कहानियाँ दर्शाती हैं कि सुविधाएं सफलता की गारंटी नहीं होतीं; इच्छाशक्ति, मेहनत और हौसला ही चैंपियन बनाते हैं।

 सरकारी सहयोग और प्रोत्साहन

इस खुशनुमा दौर में सरकारी और खेल संघों का सहयोग भी एक महत्वपूर्ण कारक रहा है:

‘खेलो इंडिया’ जैसी पहलों ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें प्रशिक्षित करने में मदद की है।

हॉकी इंडिया जैसी संस्थाएं अब खिलाड़ियों को बेहतर उपकरण और सुविधाएं प्रदान कर रही हैं, जिससे प्रशिक्षण का स्तर सुधरा है।

पुरस्कार राशि और सम्मान में वृद्धि ने महिला खिलाड़ियों को खेलों में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया है।

नए युग की शुरुआत

वह समय अब बीत चुका है जब खेलों को लड़कियों के लिए “दूसरी प्राथमिकता” माना जाता था। आज वे खेलों में करियर चुनने से पहले झिझकती नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ती हैं। यह बदलाव अभिभावकों की सोच, सरकार की नीतियों और खिलाड़ियों की दृढ़ इच्छाशक्ति—तीनों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।

2. विश्व पटल पर सुनहरी सफलताएँ

भारतीय बेटियों ने लगभग हर खेल में अपनी छाप छोड़ी है—

बॉक्सिंग में निकहत ज़रीन और लवलीना बोरगोहेन,

बैडमिंटन में पी.वी. सिंधु और साइना नेहवाल,

वेटलिफ्टिंग में मीराबाई चानू,

कुश्ती में विनेश फोगाट और साक्षी मलिक,

एथलेटिक्स में हिमा दास और ज्योति याराजी,

हॉकी और क्रिकेट टीमों में युवा खिलाड़ी,

इन सभी ने पदकों और प्रदर्शन के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि प्रतिभा लिंग पर निर्भर नहीं होती।

3. चुनौतियों से जंग जीतती बेटियाँ

ये उपलब्धियाँ सरल नहीं थीं। सामाजिक दबाव, संसाधनों की कमी, पारिवारिक आर्थिक चुनौतियाँ और खेल सुविधाओं तक पहुँच—इन सबके बावजूद बेटियों ने अपने सपनों को जीवित रखा। फिटनेस, कठोर अभ्यास और मानसिक सहनशक्ति के बल पर उन्होंने वे सीमाएँ तोड़ीं, जिन्हें कभी उनके लिए असंभव माना जाता था।

4. मैदान पर बदली मानसिकता

आज बेटियाँ सिर्फ खेल नहीं रही हैं, बल्कि खेल की भाषा बदल रही हैं। वे आत्मविश्वास, अनुशासन और पेशेवर दृष्टिकोण का नया मानक स्थापित कर रही हैं। मैदान में उनका आक्रामक और निर्भीक खेल यह संदेश देता है कि भारतीय महिलाओं को अब पीछे धकेलना आसान नहीं।

5. नीति, प्रोत्साहन और नई पहलें

सरकारी योजनाएँ जैसे—

खे लो इंडिया,

टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम ),

बेटी बचाओ—बेटी पढ़ाओ का व्यापक सामाजिक प्रभाव,

इनसे बेटियों को बेहतर प्रशिक्षण, पोषण और अंतरराष्ट्रीय खुलासा मिला है। निजी स्पॉन्सरशिप और लीग आधारित खेलों ने भी उनके लिए नए रास्ते खोले हैं।

6. रोल मॉडल बनती खिलाड़ी

आज भारतीय बेटियाँ न केवल पदक जीत रही हैं, बल्कि अगले पीढ़ी की प्रेरणा बन चुकी हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आई लड़कियाँ जब विश्व चैंपियन बनती हैं, तो यह संदेश हर घर तक पहुँचता है—“सपने देखने का अधिकार सबको है।”

7. भविष्य का सुनहरा क्षितिज

भारत के लिए यह खुशनुमा दौर सिर्फ शुरुआत है। बेहतर सुविधाएँ, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान और जमीनी स्तर पर प्रतिभा खोजने की मजबूत प्रणाली भारत को आने वाले वर्षों में महिला खेलों की एक महाशक्ति बना सकती है।

 भविष्य की राह

भारतीय बेटियों की सफलता समाज में महिला सशक्तिकरण के एक बड़े आंदोलन का प्रतीक है। जब एक बेटी खेल के मैदान पर तिरंगा लहराती है, तो वह पूरे देश को, खासकर अन्य लड़कियों को, यह संदेश देती है कि सपने देखना और उन्हें पूरा करना संभव है।

यह दौर केवल पदकों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिकता में बदलाव का दौर है। माता-पिता अब अपनी बेटियों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। भारतीय बेटियों ने साबित कर दिया है कि अगर उन्हें समान अवसर और सहयोग मिले, तो वे किसी भी क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बन सकती हैं।

यह खुशनुमा दौर भारत के लिए केवल एक शुरुआत है, और उम्मीद है कि आने वाले समय में हमारी बेटियाँ खेल के हर क्षेत्र में अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित करती रहेंगी और देश का गौरव बढ़ाती रहेंगी।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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