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कोमा, करुणा और संविधान: गाजियाबाद मामला और गरिमापूर्ण मृत्यु का सवाल

News-Desk by News-Desk
December 14, 2025
in देश
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आधुनिक दौर में एड्स: चुनौतियां, समाधान और भविष्य की दिशा-एक विवेचन(1 दिसंबर विश्व एड्स दिवस पर विशेष आलेख)




-सुनील कुमार महला

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हमारे देश में इच्छा मृत्यु एक बहुत ही संवेदनशील और जटिल मुद्दा है।इस क्रम में गाजियाबाद का रहने वाला एक परिवार अपने जवान बेटे के लिए सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु मांग रहा है तथा इस संबंध में 11 दिसंबर 2025 को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एम्स को रिपोर्ट बनाने को कहा है। मीडिया में उपलब्ध जानकारी अनुसार इस संदर्भ में अब अगली सुनवाई 18 दिसंबर को होनी है। पाठकों को बताता चलूं कि इससे पहले गाजियाबाद का यह दंपति  दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसी अर्जी लगा चुके हैं, लेकिन तब इसे खारिज कर दिया गया था। दरअसल, गाजियाबाद की इस दंपति का बेटा साल 2013 में चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था और वह हास्टल की चौथी मंजिल से गिर गया था और इसकी वज़ह से हम कोमा में चला गया। जानकारी के अनुसार गाजियाबाद की इस दंपति के पास अपने बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए वे अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांग रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस दंपति के बेटे के एक महीने का मेडिकल खर्च 25-30 हजार रुपए है तथा उसे क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी है, जिसमें मरीज़ फीडिंग ट्यूब और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है तथा रिकवरी की गुंजाइश न के बराबर होती है।लगभग 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से इस दंपति के बेटे के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं तथा उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है। यह स्थिति स्वयं मरीज के लिए बहुत ही दर्दनाक है तथा परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है और यही कारण है कि परिवार अपने बेटे के लिए न्यायालय से इच्छा मृत्यु मांग रहा है। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि हमारे देश के संविधान में यदि हम इच्छा मृत्यु के कानून की बात करें तो वर्ष 2005 में कॉमन कॉज नाम के एक एनजीओ (गैर-सरकारी संगठन) ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर 9 मार्च 2018 को सीजेआइ दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘अगर किसी मरीज को लाइलाज बीमारी हो या वेजिटेटिव स्टेट में यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही जिंदा हो, तो प्राकृतिक तरीके से मृत्यु के लिए उसका इलाज बंद किया जा सकता है। इसे इच्छामृत्यु नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार माना जाएगा।’ यह अधिकार संविधान के आर्टिकल(अनुच्छेद ) 21 का हिस्सा है, जिसमें सम्मान से जीने के साथ सम्मान से मरने का अधिकार है। पाठकों को बताता चलूं कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्रदान करता है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या स्वतंत्रता से केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जा सकता है। इसका आशय यह है कि राज्य या कोई भी संस्था मनमाने ढंग से किसी की आज़ादी या जीवन नहीं छीन सकती। सुप्रीम कोर्ट की व्याख्याओं के माध्यम से अनुच्छेद 21 का दायरा समय के साथ व्यापक हुआ है, जिसमें गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, निजता तथा जीवन के अंतिम चरण में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल माने गए हैं। इस प्रकार अनुच्छेद 21 मानव जीवन की सुरक्षा और सम्मान का संवैधानिक आधार है। हाल फिलहाल, यहां यह भी उल्लेखनीय है वर्ष 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को वैधता प्रदान करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो तरह के नियम जिनमें क्रमशः ‘जब मरीज ने पहले ही ‘लिविंग विल’ लिख रखी हो’ तथा ‘जब कोई ‘लिविंग विल’ न हो, बनाए थे। यहां यदि हम ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की बात करें तो इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर कोई नया काम नहीं करते, सिर्फ इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है। वहीं दूसरी ओर ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ में मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं तथा भारत में यह गैर-कानूनी है। अगर कोई जान-बूझकर किसी मरीज को दवाई देकर मारता है, तो इसे बीएनएस(भारतीय न्याय संहिता) की धारा के तहत हत्या या के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है। हाल फिलहाल, इच्छा मृत्यु का मुद्दा लंबे समय से सार्वजनिक बहस का विषय रहा है कि क्या असाध्य और अत्यंत कष्टदायक परिस्थितियों में इच्छामृत्यु की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं ?समय-समय पर अदालतों ने इस विषय पर मार्गदर्शन दिया है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि कहीं इस छूट का दुरुपयोग न हो। गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले पर स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि अब कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि ऐसे त्रासद जीवन की कोई तार्किकता नहीं रह जाती है।यह मामला एक 32 वर्षीय युवक से जुड़ा है, जो पिछले 13 वर्षों से कोमा जैसी अवस्था में है। अब यह केवल एक चिकित्सीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न बन चुका है। वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बताती है कि देश अब जीवन के अंतिम दौर में अनावश्यक पीड़ा से मुक्त, सम्मानजनक विदाई के अधिकार को गंभीरता से समझने लगा है। अरुणा शानबाग मामले(वर्ष 2011) में, जो कि 42 सालों तक कोमा जैसी स्थिति में रहीं थीं, अदालत ने पहली बार माना था कि अगर कोई व्यक्ति असाध्य स्थिति में है और उसका जीवन सिर्फ मशीनों के सहारे चल रहा है, तो इलाज को जारी न रखना हत्या नहीं, बल्कि करुणा का निर्णय हो सकता है। हालांकि, यह छूट बहुत सख्त नियमों और निगरानी के साथ दी गई थी, ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके। यहां यह उल्लेखनीय है कि अरूणा शानबाग मामला भारत के सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में से एक है। दरअसल , अरूणा रामचंद्र शानबाग मुंबई के एक अस्पताल(किंग एडवार्ड मैमोरियल हास्पीटल) में नर्स थीं। 27 नवंबर 1973 को उसी अस्पताल के एक वार्ड बॉय ने उनके साथ क्रूर यौन हिंसा की और कुत्ते की जंजीर से गला दबाने से उनके मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुँची। ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक जाने के कारण वे जीवनभर के लिए चेतनाहीन अवस्था,जिसे ‘कोमा’ (पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट) भी कहा जाता है, में चली गईं और लगभग 42 वर्षों तक न बोल सकीं, न स्वयं चल-फिर सकीं। बाद में, 18 मई 2015 को न्यूमोनिया से शानबाग की मृत्यु हो गई।हालांकि,आरोपी वार्ड बॉय को सिर्फ़ 7 साल की जेल हुई, और उसे 1980 में रिहा कर दिया गया। वर्ष 2011 में पत्रकार पिंकी विरानी ने उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दायर की। इसे यूटनेशिया (दान की मृत्यु) के नाम से जाना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अरूणा के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति तो नहीं दी, लेकिन इसी फैसले के माध्यम से भारत में पहली बार ‘पासिव यूथेनेशिया’ यानी जीवनरक्षक उपकरण हटाने को सशर्त वैध माना। इस प्रकार यह मामला न केवल एक अमानवीय अपराध की कहानी है, बल्कि गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर भारत में कानूनी बहस का आधार भी बना।कुल मिलाकर, यह फैसला जीवन को खत्म करने की नहीं, बल्कि मानव गरिमा को बनाए रखने की सोच को स्वीकार करने की दिशा में एक अहम कदम माना जाता है। इसके बाद वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने, जैसा कि इस आलेख में ऊपर भी चर्चा कर चुका हूं कि, निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी और इसके लिए एक स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की, ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके। आगे चलकर वर्ष 2023 में अदालत ने इन दिशा-निर्देशों को और सरल बनाया और यह तय किया कि ऐसे मामलों में प्राथमिक और माध्यमिक चिकित्सा बोर्ड मरीज की स्थिति का मूल्यांकन करेंगे। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में देश में यही प्रक्रिया लागू है। बहरहाल, वर्तमान मामले ने दिखा दिया है कि हमारी व्यवस्था में आज भी कई कमियां हैं। लंबे समय से कोमा में पड़े मरीजों की घर पर ठीक से देखभाल कर पाना बहुत मुश्किल होता है। यह बहुत ही दुखद है कि ऐसे परिवारों को सरकार की ओर से भी पूरा सहयोग नहीं मिल पाता। ऊपर से, जीवन और मृत्यु से जुड़े नैतिक सवाल इस स्थिति को और उलझा देते हैं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संभवतः यह किसी युवा वयस्क के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की पहली स्पष्ट स्वीकृति बन सकता है। आज देश में हजारों मरीज वर्षों से कोमा जैसी स्थिति में जी रहे हैं, जो न केवल उनके लिए बल्कि उनके परिवारों के लिए भी एक बड़ी त्रासदी है। कितनी बड़ी बात है कि परिवार भावनात्मक तनाव के साथ-साथ लगातार बढ़ते आर्थिक बोझ से भी लगातार जूझते हैं। अंत में यही कहूंगा कि हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन और मृत्यु के अधिकार पर भी इस संदर्भ में सवाल उठते रहे हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसे मामलों में अदालत को केवल जैविक जीवन को जबरन लंबा खींचने के बजाय मरीज की पीड़ा और परिवार की व्यथा को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि एम्स 17 दिसंबर तक यह पुष्टि करता है कि मरीज का जीवन पूरी तरह निरर्थक हो चुका है, तो निष्क्रिय इच्छामृत्यु(पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकती है। यदि माननीय कोर्ट द्वारा इच्छामृत्यु जैसी संवेदनशील व्यवस्था को अनुमति दी जाती है, तो उसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े और स्पष्ट सुरक्षा उपाय तय करना बहुत ही आवश्यक व जरूरी हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि लंबे समय से कोमा में या अत्यधिक पीड़ा झेल रहे मरीजों के लिए सरकार को ऐसे साफ और स्पष्ट नियम बनाने चाहिए,जो मानवता के हित में हों। इलाज के साथ-साथ ऐसे मरीजों की नियमित देखभाल, परिवार को आर्थिक संबल/सहायता और मानसिक सहारा भी बहुत ही जरूरी व आवश्यक है।यह बात बिल्कुल ठीक है कि किसी भी जीवन का सम्मान हमेशा होना चाहिए, लेकिन असहनीय दर्द/तकलीफ़ और दुःख को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। वास्तव में, यदि कोई मरीज पूरी समझ के साथ स्वयं इच्छामृत्यु चाहता है, तो इसे क्रूरता नहीं बल्कि करुणा समझा जाना चाहिए। अदालतों से यह अपेक्षा की जाती है कि अदालतें संवेदनशील और संतुलित फैसले देकर मरीज को अनावश्यक कष्ट से राहत दिलाएं,उसके परिवार व परिजनों के बारे में भी सोचें और समाज को मानवीय रास्ता दिखाएं।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।

मोबाइल 9828108858

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