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अमेरिकी वर्चस्व,वेनेजुएला संकट और भारत पर दबाव की राजनीति: वैश्विक शक्ति संतुलन की निर्णायक परीक्षा

News-Desk by News-Desk
January 6, 2026
in विदेश
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अमेरिकी वर्चस्व,वेनेजुएला संकट और भारत पर दबाव की राजनीति: वैश्विक शक्ति संतुलन की निर्णायक परीक्षा

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एकतरफा विश्व व्यवस्था की वापसी?- क्या दुनियाँ फिर से शक्ति ही न्याय है के सिद्धांत की ओर लौट रही है?

निजी कंपनी,राष्ट्रीय नीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सीधा प्रभाव राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति पर पड़ता है व आर्थिक संप्रभुता धीरे-धीरे कमजोर होती है?- एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर  21वीं सदी के तीसरे दशक में विश्व एक ऐसे दौर से गुजर रहा है,जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून संप्रभुता और बहुपक्षीय व्यवस्था की अवधारणाएँ बार- बार शक्तिशाली देशों की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के सामने कमजोर पड़ती दिख रही हैं।अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को कथित रूप से बंधक बनाए जाने की घटना उसके बाद वेनेजुएला में शांति तक अमेरिकी नियंत्रण की घोषणा और समानांतर रूप से भारत को रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर दी गई खुली धमकी ये तीनों घटनाएँ मिलकर वैश्विक राजनीति में एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती हैं: क्या दुनियाँ फिर से शक्ति ही न्याय है के सिद्धांत की ओर लौट रही है? ट्रंप क़ा बयान आया क़ि यह कदम मुझे खुश करने के लिए उठाया गया:यह कूटनीतिक संकेत या मनो वैज्ञानिक दबाव?यह बयानबाजी अमेरिकी राजनीति की उस शैली को दर्शाती है, जिसमें अस्पष्टता को भी रणनीति बनाया जाता है। यह कथन भारत सहित कई देशों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं पर्दे के पीछे कोई दबावपूर्ण सौदे तो नहीं हो रहे।जिसका खुलासा 6 जनवरी 2025 को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा एक्स पर दिया गया बयान हैं जिसपर हम कह सकते हैं,रिलायंस इंडस्ट्रीज और रूसी तेल: अर्थशास्त्र बनाम राजनीति हो रही है रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा एक्स (पूर्व ट्विटर) पर दिया गया बयान कि तीन हफ्तों से रिफाइनरी में कोई भी तेल कार्गो नहीं आया है और जनवरी में किसी भी रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी की उम्मीद नहीं है, यह वैश्विक ऊर्जा बाजार की संवेदनशीलता को उजागर करता है। यह निर्णय राजनीतिक दबाव से लिया गया या व्यावसायिक कारणों से, यह सवाल अपने- आप में गंभीर है।निजी कंपनी राष्ट्रीयनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव-रिलायंस जैसी निजी कंपनी का निर्णय केवल कॉर्पोरेट रणनीति नहीं रहता;उसका सीधा प्रभाव राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति पर पड़ता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास  भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि  यदि कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय दबाव में फैसले लेने लगें, तो यह सवाल उठता है कि क्या आर्थिक संप्रभुता धीरे-धीरे कमजोर हो रही है?ट्रंप की राजनीति संस्थाओं से अधिक व्यक्ति-केंद्रित रही है। उनके बयानों में अकसर विदेश नीति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से संचालित होती दिखती है। यह स्थिति वैश्विक स्थिरता के लिए खतरनाक है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी एक व्यक्ति के मूड पर निर्भर नहीं हो सकते।

साथियों बात अगर हम वेनेजुएला संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत को यह धमकी देना कि यदि उसने रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया तो भारतीय सामानों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाएंगे,इसको समझने की करें तो  भारत की ऊर्जा संप्रभुता पर सीधा हमला है। भारत अपनी 85 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है। ऐसे में सस्ता रूसी तेल न केवल आर्थिक विवशता है,बल्कि घरेलू महंगाई नियंत्रित रखने का भी अनिवार्य साधन है।क्याभारत से स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ने की अपेक्षा है?यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या अमेरिका भारत को केवल एक रणनीतिक साझेदार नहीं,बल्कि एक आज्ञाकारी सहयोगी के रूप में देखना चाहता है? यदि भारत से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी ऊर्जा नीति,व्यापार नीति और कूटनीति अमेरिका के निर्देशों के अनुसार तय करे, तो यह भारत की गुटनिरपेक्ष परंपरा और रणनीतिक स्वायत्तता के बिल्कुल विपरीत है।एकतरफा टैरिफ लगाने की धमकी विश्व व्यापार संगठन के मूल सिद्धांतों, निष्पक्षता, बहुपक्षीयता और नियम- आधारित व्यापार को कमजोर करती है। अमेरिका पहले भी चीन, यूरोपीय संघ और अब भारत के साथ इसी हथियार का प्रयोग करता रहा है। यह वैश्विक व्यापार को नियमों से नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन से चलाने की कोशिश है।

साथियों बात अगर हम घरेलू राजनीतिमें अंतरराष्ट्रीयमुद्दों में विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने की करें तोदिल्ली के पूर्वमंत्री द्वारा इस मुद्दे पर ली गई चुटकी अब सत्ताधारी पार्टी क्या जवाब देगी?यह दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अब केवल विदेश मंत्रालय का विषय नहीं रही। घरेलू राजनीति में भी यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या भारत अमेरिकी दबाव में झुक रहा है, या यह महज संयोग है।राष्ट्रहित बनाम राजनीतिक लाभ-हालाँकि विपक्ष का काम सवाल उठाना है,लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संतुलन आवश्यक है। यह प्रश्न राष्ट्रहित से जुड़ा है,क्या भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखेगा,या वैश्विक शक्ति संघर्ष में किसी एक ध्रुव के अधीन हो जाएगा?

साथियों बात अगर हम दूसरी ओर यह समझने की करें कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति को बंधक बनाना:अंतरराष्ट्रीय कानून पर सीधा आघात तो हम पाएंगे क़ि,संप्रभु राष्ट्र के मुखिया की गिरफ्तारी:कूटनीति याअपहरण? अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पकड़कर अपने नियंत्रण में लेने की घटना केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर,वियना कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता के मूल सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन प्रतीत होती है। किसी भी देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को इस प्रकार हिरासत में लेना, वह भी बिना अंतरराष्ट्रीय सहमति या संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति के, वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक खतरनाक मिसाल स्थापित करता है।शांति तक अमेरिकी कंट्रोल: लोकतंत्र की भाषा में अधिनायकवाद- अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा यह कहना कि जब तक वेनेजुएला में शांति स्थापित नहीं हो जाती, तब तक वहां अमेरिकी नियंत्रण रहेगा, औपनिवेशिक युग की मानसिकता की याद दिलाता है। यह वही तर्क है जिसका उपयोग अतीत में अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में किया गया,जहाँ लोकतंत्र लाने के नाम पर दशकों तक अस्थिरता, गृहयुद्ध और संसाधनों की लूट होती रही।लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप का बहुत पुराना इतिहास वेनेजुएला संकट को अलग- थलग नहीं देखा जा सकता। यह उस लंबी श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका ने लैटिन अमेरिका के देशों,चिली, क्यूबा, निकारागुआ, पनामा,में सरकारें गिराईं, राष्ट्रपति बदले और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए जनता को सजा दी। वेनेजुएला का तेल-समृद्ध होना इस पूरे प्रकरण का केंद्रीय कारण है, जिसे मानवीय चिंता की आड़ में ढका जा रहा है।

साथियों बात अगर हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य: बहुध्रुवीय विश्व बनाम अमेरिकी एकाधिकार को समझने की करें तो रूस, चीन और वैश्विक दक्षिण की प्रतिक्रिया, वेनेजुएला प्रकरण और भारत को दी गई धमकी पर रूस, चीन और वैश्विक दक्षिण के देशों की नजरें टिकी हैं। यह घटनाएँ उन्हें और अधिक अमेरिका-विरोधी गुटबंदी की ओर धकेल सकती हैं, जिससे दुनिया एक बार फिर शीत युद्ध जैसी स्थिति में प्रवेश कर सकती है।भारत की ऐतिहासिक भूमिका:संतुलनकारी शक्ति- भारत अब केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि उभरती वैश्विक शक्ति है। उसकी भूमिका केवल किसी एक धड़े का हिस्सा बनने की नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने की है। रूस से तेल खरीदना कोई वैचारिक निर्णय नहीं, बल्कि व्यावहारिक और राष्ट्रीय हित का फैसला है।

साथियों बात अगर हम इस पूरे मामलों को संवैधानिक आर्थिक वैश्विक परिपेक्ष में समझने की करें तो,संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का मूल प्रश्न वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति को अमेरिकी नियंत्रण में लेना अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2(4) तथा राज्य की संप्रभु समानता के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है। किसी भी राष्ट्र के आंतरिक राजनीतिक ढाँचे में बाहरी सैन्य या प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करना आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में अवैध हस्तक्षेप की श्रेणी में आता है।भारत की संवैधानिक विदेश नीति की कसौटी भारतीय संविधान का अनुच्छेद -51 अंतरराष्ट्रीय शांति, संप्रभुता के सम्मान और स्वतंत्र विदेश नीति को बढ़ावा देने का निर्देश देता है। रूस से तेल खरीदना भारत का संवैधानिक अधिकार है, क्योंकि ऊर्जा नीति राज्य के आर्थिक अस्तित्व से जुड़ी है। किसी बाहरी शक्ति द्वारा टैरिफ की धमकी देना अप्रत्यक्ष आर्थिक दबाव के अंतर्गत आता है।भारत अपनी 85 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की आवश्यकता आयात से पूरी करता है।रूसी तेल की रियायती कीमतें भारत के लिए केवल आर्थिक लाभ नहीं,बल्कि मुद्रास्फीति नियंत्रण, राजकोषीय स्थिरता और उपभोक्ता हित से जुड़ा प्रश्न हैं।अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने पर आपत्ति आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोई नैतिक स्रोत नहीं होता,केवल मूल्य, उपलब्धता और स्थिर आपूर्ति होती है।यदि भारत रूसी तेल छोड़ता है, तो उसे महँगा पश्चिम एशियाई याअमेरिकी तेल खरीदना पड़ेगा, जिससे घरेलू कीमतें बढ़ेंगी।रिलायंस द्वारा रूसी तेल कार्गो न आने की सूचना यह दर्शाती है कि निजी कंपनियाँ भी भू-राजनीतिक जोखिम को कीमत में बदलकर देख रही हैं।यह बाजार- निर्णय है, न कि वैचारिक। किंतु दीर्घकाल में यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को कमजोर कर सकता है।भारत पर अमेरिकी दबाव न तो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है और न ही विश्व व्यापार संगठन  की भावना के। यदि भारत दबाव में नीति बदलता है, तो यह संवैधानिक स्वायत्तता और रणनीतिक स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाएगा।ऊर्जा नीति यदि दबाव में बदली गई, तो इसका सीधा असर महँगाई, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और आम नागरिक पर पड़ेगा,जो किसी भी सरकार के लिए आर्थिक जोखिम है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि निर्णय का क्षण संप्रभुता या दबाव?वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप, भारत को टैरिफ की धमकी, और रूसी तेल के इर्द-गिर्द बना दबाव,ये सभी घटनाएँ मिलकर संकेत देती हैं कि विश्व एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि अमेरिका क्या चाहता है, सवाल यह है कि भारत क्या चाहता है, एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और संतुलित वैश्विक भूमिका, या फिर दबाव में ली गई नीतियाँ।यह समय भारत के लिए केवल प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि स्पष्ट और दृढ़ नीति अपनाने का है,जहाँ राष्ट्रीय हित, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय व्यवस्था तीनों का संतुलन बना रहे।भारत की शक्ति किसी टकराव में नहीं, बल्कि संतुलन में है। दबाव में झुकना नहीं, और अनावश्यक टकराव भी नहीं,यही भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सफलता की कुंजी है।

*-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425*

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