आज का युग विज्ञान और तकनीक का युग है। ऐसे समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल तथ्यों को रटाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। यही क्षमता वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है—हर बात को प्रश्नों के माध्यम से समझना, प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष निकालना और अंधविश्वास या पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सत्य की खोज करना।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण शिक्षा को जीवंत और अर्थपूर्ण बनाता है। जब छात्र “क्यों” और “कैसे” जैसे प्रश्न पूछते हैं, तो वे ज्ञान के सक्रिय सहभागी बनते हैं, न कि केवल निष्क्रिय श्रोता। इससे उनमें जिज्ञासा, रचनात्मकता और नवाचार की भावना विकसित होती है। प्रयोग, अवलोकन और तर्क के माध्यम से सीखा गया ज्ञान अधिक स्थायी होता है।
शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक बड़ा लाभ यह है कि यह आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है। छात्र किसी भी जानकारी को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसके स्रोत, तर्क और प्रमाण की जाँच करते हैं। यह आदत उन्हें न केवल परीक्षा में, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सही निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।
इसके साथ ही, वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़ियों और गलत धारणाओं को चुनौती देता है। जब शिक्षा तर्क और प्रमाण पर आधारित होती है, तो छात्र सामाजिक कुरीतियों को समझ पाते हैं और बदलाव के वाहक बनते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक सोच लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी समाज की नींव रखती है।
आज की शिक्षा प्रणाली में एसटीएम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) के साथ-साथ सामाजिक विज्ञान और मानविकी में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र या भाषा—हर विषय में विश्लेषण, प्रमाण और तार्किक निष्कर्ष की भूमिका अहम है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मुख्य तत्व
शिक्षा के माध्यम से छात्रों में निम्नलिखित गुणों का विकास होता है:
जिज्ञासा : हर ‘क्या’ और ‘कैसे’ के पीछे ‘क्यों’ को खोजने की प्रवृत्ति।
तार्किकता : किसी भी बात को केवल इसलिए स्वीकार न करना क्योंकि वह पुरानी है, बल्कि उसे तर्क की कसौटी पर कसना।
साक्ष्य आधारित सोच : निर्णय लेने से पहले तथ्यों और प्रमाणों की जाँच करना।
खुला मस्तिष्क: नए विचारों को स्वीकार करने और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता।
शिक्षा में इसका महत्व
1. अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों का अंत समाज में व्याप्त कई कुरीतियाँ और अंधविश्वास अज्ञानता के कारण होते हैं। जब शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाती है, तो छात्र सामाजिक पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को चुनौती देने में सक्षम बनते हैं। इससे एक प्रगतिशील समाज का निर्माण होता है।
2. समस्या समाधान की क्षमता वैज्ञानिक पद्धति छात्रों को जीवन की चुनौतियों का सामना व्यवस्थित तरीके से करना सिखाती है। वे समस्याओं को टुकड़ों में बाँटना, अवलोकन करना और प्रयोगों के आधार पर समाधान निकालना सीखते हैं।
3. निर्णय लेने की क्षमता आज के ‘फेक न्यूज़’ के दौर में वैज्ञानिक दृष्टिकोण बहुत अनिवार्य है। यह छात्रों को जानकारी का विश्लेषण करने और सही-गलत में अंतर करने की शक्ति देता है, जिससे वे बेहतर नागरिक बनते हैं।
4. नवाचार और रचनात्मकता जब छात्र प्रश्न पूछने से नहीं डरते, तब नए विचारों का जन्म होता है। विज्ञान की शिक्षा रटने के बजाय ‘करके सीखने’ पर जोर देती है, जो भविष्य के वैज्ञानिकों और अन्वेषकों को तैयार करती है।
भारतीय संविधान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए (एच) के तहत, “वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना” प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य माना गया है।
निष्कर्ष
शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश एक उज्ज्वल भविष्य की नींव है। यह छात्रों को न केवल एक सफल पेशेवर बनाता है, बल्कि उन्हें एक विवेकशील और संवेदनशील इंसान के रूप में भी गढ़ता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश वैश्विक स्तर पर ज्ञान और नवाचार का नेतृत्व करे, तो हमें अपनी कक्षाओं में प्रश्न पूछने की संस्कृति को जीवित रखना होगा।
“वैज्ञानिक दृष्टिकोण केवल विज्ञान के बारे में नहीं है, यह सत्य की खोज की एक निरंतर प्रक्रिया है।”
शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का अर्थ है—छात्रों को सिर्फ उत्तर नहीं, बल्कि सही प्रश्न पूछना सिखाना। यह दृष्टिकोण उन्हें आत्मनिर्भर, विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक बनाता है। भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए ऐसी शिक्षा अनिवार्य है, जो ज्ञान के साथ-साथ वैज्ञानिक सोच भी विकसित करे।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
Post Views: 5









