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मीठे पानी का संकट: कमी नहीं, कुप्रबंधन

News-Desk by News-Desk
February 18, 2026
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मीठे पानी का संकट: कमी नहीं, कुप्रबंधन




(दुनिया आज मीठे जल की उपलब्धता और पहुँच—दोनों से जूझ रही है। मीठे जल की कमी से अधिक, उसकी पहुँच क्यों आज वैश्विक संकट है?)

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डॉ. प्रियंका सौरभ

वैश्विक मीठे जल संकट: उपलब्धता और पहुँच की दोहरी चुनौती

आज विश्व जिस सबसे गंभीर संसाधन संकट का सामना कर रहा है, उनमें मीठे जल का संकट अत्यंत गहन और बहुआयामी है। पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का लगभग 97 प्रतिशत खारा है और केवल लगभग 3 प्रतिशत मीठा जल है, जिसमें से भी बहुत छोटा भाग ही मानव उपयोग के लिए सुलभ है। इसके बावजूद, आज विश्व की 2–3 अरब आबादी वर्ष के किसी न किसी समय जल संकट से जूझती है। यह संकट केवल जल की भौतिक कमी का नहीं, बल्कि जल की घटती उपलब्धता और समान व सुरक्षित पहुँच—दोनों का संयुक्त संकट है, जो पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयामों को एक साथ प्रभावित करता है।

पिछले कुछ दशकों में मीठे जल की उपलब्धता में निरंतर गिरावट देखी गई है। इसका एक प्रमुख कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है। कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग की बढ़ती माँग ने जलभृतों पर असहनीय दबाव डाला है। हरित क्रांति के बाद सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और बोरवेल पर बढ़ती निर्भरता ने प्राकृतिक पुनर्भरण की क्षमता को पीछे छोड़ दिया है। भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों में भूजल स्तर का तीव्र पतन भविष्य की जल सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है। कई क्षेत्रों में जलभृत स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए जल उपलब्धता और भी अनिश्चित हो गई है।

जल स्रोतों का प्रदूषण मीठे जल संकट का दूसरा बड़ा कारण है। नदियों, झीलों और भूजल में बिना शोधन के छोड़ा गया घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, भारी धातुएँ और कृषि रसायन जल को अनुपयोगी बना रहे हैं। विकासशील देशों में यह समस्या और भी गंभीर है, जहाँ शोधन अवसंरचना का अभाव है। परिणामस्वरूप, कई स्थानों पर जल उपलब्ध होते हुए भी पीने योग्य नहीं रह जाता, जिससे स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है और जल की प्रभावी उपलब्धता घट जाती है।

जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमनदों का तीव्र पिघलना, वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता और सूखे-बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति देखी जा रही है। हिमालय, आल्प्स और एंडीज़ जैसे क्षेत्रों में हिमनदों का सिकुड़ना दीर्घकाल में नदियों के प्रवाह को अस्थिर कर रहा है। अल्पकाल में यह बाढ़ का कारण बनता है, जबकि दीर्घकाल में स्थायी जल संकट को जन्म देता है। मानसूनी क्षेत्रों में अनियमित वर्षा ने जल भंडारण और कृषि योजना को भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

इसके साथ ही, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक पुनर्भरण क्षेत्रों का तेजी से क्षरण हुआ है। शहरीकरण, अवैज्ञानिक भूमि उपयोग और रियल एस्टेट विकास ने झीलों, तालाबों, बाढ़ मैदानों और दलदलों को नष्ट कर दिया है। ये पारिस्थितिक तंत्र न केवल जल संग्रह और भूजल पुनर्भरण में सहायक होते हैं, बल्कि बाढ़ और सूखे के प्रभावों को भी संतुलित करते हैं। इनके विनाश से जल चक्र का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है।

जनसंख्या वृद्धि और उपभोग के बदलते पैटर्न ने भी मीठे जल पर दबाव बढ़ाया है। शहरी जीवनशैली, जल-गहन उद्योग और भोजन की बदलती आदतें—विशेषकर मांसाहारी आहार—ने प्रति व्यक्ति जल पदचिह्न को बढ़ाया है। परिणामस्वरूप, जल की माँग प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक हो गई है।

जहाँ एक ओर जल की उपलब्धता घट रही है, वहीं दूसरी ओर कई क्षेत्रों में जल उपलब्ध होते हुए भी लोगों की पहुँच उससे वंचित है। इसका प्रमुख कारण अपर्याप्त अवसंरचना है। कई देशों में जल संग्रहण, शोधन और वितरण की व्यवस्थाएँ कमजोर हैं। पुराने पाइपलाइन नेटवर्क, उच्च लीकेज और अपर्याप्त भंडारण के कारण बड़ी मात्रा में जल उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार विकासशील देशों में शहरी जल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा वितरण के दौरान ही नष्ट हो जाता है।

इसके अतिरिक्त, जल गुणवत्ता की समस्या भी पहुँच को सीमित करती है। जहाँ जल भौतिक रूप से उपलब्ध है, वहाँ भी प्रदूषण के कारण वह पीने योग्य नहीं रहता। दूषित जल से होने वाली बीमारियाँ आज भी कई देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती हैं, जिससे गरीब और हाशियाकृत समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

राजनीतिक और कानूनी बाधाएँ भी जल तक पहुँच को सीमित करती हैं। जल एक साझा संसाधन है, जिसके कारण अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय विवाद उत्पन्न होते हैं। नदियों के बँटवारे, संघीय ढाँचे में अधिकारों के टकराव और अंतरराष्ट्रीय नदी समझौतों की जटिलताओं के कारण कई बार जल-समृद्ध क्षेत्रों में भी समान पहुँच संभव नहीं हो पाती।

सामाजिक असमानता इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। जल संकट का सबसे बड़ा बोझ समाज के कमजोर वर्गों—ग्रामीण गरीबों, शहरी झुग्गी बस्तियों, महिलाओं और बच्चों—पर पड़ता है। कई स्थानों पर सामाजिक भेदभाव, गरीबी और वहन क्षमता की कमी के कारण सुरक्षित जल तक समान पहुँच नहीं मिल पाती, जिससे असमानता और गहरी हो जाती है।

कमजोर जल शासन भी समस्या को जटिल बनाता है। जल प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं में समन्वय की कमी, विश्वसनीय डेटा का अभाव और अल्पकालिक नीतियाँ दीर्घकालिक समाधान के मार्ग में बाधा बनती हैं। कई देशों में जल से जुड़े अधिकार और जिम्मेदारियाँ अनेक मंत्रालयों और एजेंसियों में बँटी होती हैं, जिससे एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाता।

मौसमी असंतुलन भी जल पहुँच की समस्या को बढ़ाता है। मानसूनी क्षेत्रों में वर्षा कुछ महीनों तक अत्यधिक होती है, जबकि शेष वर्ष जल अभाव बना रहता है। अपर्याप्त भंडारण और प्रबंधन के कारण यह मौसमी जल स्थायी उपलब्धता में परिवर्तित नहीं हो पाता। चेन्नई और केप टाउन जैसे शहर इस विरोधाभास के प्रमुख उदाहरण हैं, जहाँ बाढ़ और सूखा एक ही वर्ष में देखने को मिलते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें लगातार चेतावनी देती रही हैं कि मीठे जल का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और वैश्विक शांति से भी गहराई से जुड़ा है। जल की कमी आज संघर्ष, प्रवासन और आजीविका संकट का एक उभरता कारण बन रही है।

अंततः, मीठे जल का संकट मानवता के सामने खड़ी सबसे बड़ी साझा चुनौतियों में से एक है। यह स्पष्ट है कि यह समस्या केवल प्राकृतिक सीमाओं की नहीं, बल्कि मानव निर्मित नीतिगत और प्रबंधन विफलताओं की भी है। यदि समय रहते सतत जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, आर्द्रभूमि संरक्षण, समावेशी जल शासन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता दी जाए, तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है। जल सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा अनिवार्य दायित्व है।

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