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सिंधी दिवस 10 अप्रैल 2025 – सिंधी अंबाणी बोली….मिठिड़ी अबाणी बोली 

News-Desk by News-Desk
April 10, 2025
in ट्रेंडिंग न्यूज़, देश
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सिंधी दिवस 10 अप्रैल 2025 – सिंधी अंबाणी बोली….मिठिड़ी अबाणी बोली 

 

सिंधी दिवस 10 अप्रैल 2025 – सिंधी अंबाणी बोली….मिठिड़ी अबाणी बोली 

भारत में हर समाज की मातृभाषा ही उसकी संस्कृति अभिव्यक्ति व समाज और व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है।

आओ भाषाओं की मिठास को पहचानें-सिंधियत की समृद्ध संस्कृति परंपराओं व सिंधी भाषा को बचाए रखना हम सभी के लिए चुनौती-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पूरी दुनियां में भारत ही एक ऐसा अकेला देश है, जहां बहुत भारी तादाद में हर समाज भाषाओं उपभाषाओं,बोलियां में अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करता है। यह भाषाएं व बोलियां इतनी मीठी होती है कि हर भाषा को बोलने के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है कि काश मैं यह भाषा बोल पाता। तमिल तेलुगू सिंधी संस्कृति बंगाली मराठी असमिया मारवाड़ी पंजाबी गुजराती सहित पूरे भारत में हजारों लाखों बोलियां है, जिनकी मिठास का अद्भुत आगाज़ होता है, परंतु हमारे संविधान निर्माता और बाद में संशोधन द्वारा भारत में संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को दर्ज किया गया है, इसमें से एक बहुत ही प्यारी मीठी बोली और भाषा सिंधी है, जिसे 10 अप्रैल 1967 से लागू की याद गया था और इसी दिन को सिंधी समाज हर वर्ष सिंधी भाषा दिवस के रूप में मनाता है बहुत कार्यक्रम किए जाते हैं, खुशियां मनाई जाती है। चूंकि सिंधी भाषा को 1967 में 21वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा आठवीं अनुसूची में 10 अप्रैल को ही लागू हुआ था इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जान कारी के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे,हर समाज की मातृभाषा उसकी संस्कृति अभिव्यक्ति समाज और व्यक्तित्व का प्रति निधित्व करती है इसलिए आओ भाषा की मिठास को पहचाने।
साथियों बात अगर हम सिंधियत की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और सबसे महत्वपूर्ण सिंधी भाषा को बचाए रखने की करें तो, सिंधी समुदाय पूरी दुनियाँ में फैला हुआ है।आज सिंधी वैश्विक नागरिक बन चुके हैं। लेकिन, इससे एक नई चुनौती भी पैदा हुईहै।सिंधियत की समृद्धसंस्कृति परंपराओं और सबसे महत्वपूर्ण सिंधी भाषा को बचाए रखना हम सभी के लिए चुनौती बन गया है। सिंधियत को बचाए रखने के लिए हमें हर सदस्य के सहयोग की जरूरत है। सिंधी भाषा को बढ़ावा देने और लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत कुछ करना होगा, खासकर युवा पीढ़ी के बीच। हमें गैर सिंधी छात्रों के बीच भी सिंधी को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करने होंगे। अगर जरूरत पड़े तो हमें सिंधी भाषा और संस्कृति में अध्ययन करने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति देनी चाहिए।आज केवल सिंधी भाषा ही नहीं, अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रयोग के कारण सभी क्षेत्रीय भाषाएं खतरे में हैं। हमें यह सोचना होगा कि प्रौद्योगिकी किस प्रकार नई पीढ़ी तक पहुंचने तथा सिंधी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं एवं साहित्य को बढ़ावा देने में हमारी मदद कर सकती है। सिंधी भाषा दिवस 10 अप्रैल 2025 के अवसर पर हम सभी खुशियाँ मना रहे हैं, आइए हम सब अपनी भाषा को संरक्षित और बढ़ावा देने का संकल्प लें।
साथियों बात अगर हम सिंधी भाषा के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की करें तो, सिंधी भाषा को 1967 के 21 वें संशोधन अधिनियम द्वारा 8वीं अनुसूची में जोड़ा गया था आठवीं अनुसूची उन भाषाओं को सूचीबद्ध करती है जिन्हें विकसित करने कीजिम्मेदारी भारत सरकार के पास है।संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाओं को शामिल किया गया था। 1992 में अधिनियमित 71वें संशोधन में तीन औरभाषाएं जैसे कोंकणी, मैतेई (मणिपुरी) और नेपाली शामिल की गई थीं। 92वें संशोधन ने 2003 में बोडो, डोगरी, संथाली और मैथली को जोड़ा, जिससे भाषाओं की कुल संख्या 22 हो गई। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। भारतीय संविधान का भाग अनुच्छेद 343 से 351 तक भारत की आधिकारिक भाषाओं से संबंधित है। मूल रूप से, केवल 14 भाषाओं का उल्लेख किया गया था और बाद में, कई संशोधनों के बाद, अन्य भाषाओं कोजोड़ा गया था। भारत के संविधान में और संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। उद्धरण 21वाँ संशोधन, प्रादेशिक सीमा भारत द्वारा पारित, राज्य सभा उत्तीर्ण 4 अप्रैल 1967 द्वारा पारित लोकसभा उत्तीर्ण,7 अप्रैल 1967 को सहमति दी गई व 10 अप्रैल 1967 शुरू किया।
साथियों बात अगर हम सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने के कारणों की करें तो,संविधान (इक्कीसवां संशोधन) अधिनियम,1967, संविधान (इक्कीसवां संशोधन) विधेयक,1966 (1966 का विधेयक संख्या ग्ग्प्ट) से जुड़े उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (इक्कीसवां संशोधन) अधिनियम,1967 के रूप में अधिनियमित किया गया था। वस्तुओं और कारणों का विवरण सिंधी भाषी लोगों की ओर से सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लगातार मांग की जाती रही थी। हालाँकि वर्तमान में सिंधी एक सुपरिभाषित क्षेत्र की क्षेत्रीय भाषा नहीं है,यह अविभाजित भारत के एक प्रांत की भाषा हुआ करती थी और, विभाजन के बिना, वैसे ही बनी रहती। भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त ने सिंधी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की भी सिफारिश की थी। 4 नवंबर, 1966 को यह घोषणा की गई कि सरकार ने सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय लिया है। विधेयक इस निर्णय को प्रभावी बनाने का प्रयास करता है। ऐसा उसमें देख में कहा गया।
साथियों बात अगर हम सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं सूची में जोड़ने की प्रक्रिया पूरी करने की करें तो,  इसे तत्कालीन गृहमंत्री यशवंतराव चव्हाण ने पेश किया था और आठवीं अनुसूची में संशोधन करने की मांग की थी। संविधान में सिंधी को अनुसूची में सूचीबद्ध भाषाओं में से एक के रूप में शामिल करने के लिए। बिल के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों के विवरण का पूरा पाठ नीचे दिया गया है।भाषाईअल्पसंख्यक आयुक्त ने सिंधी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की भी सिफारिश की थी।विधेयक इस निर्णय को प्रभावी बनाने का प्रयास करता है। वाईबी चव्हाण संविधान (बाईसवां संशोधन) विधेयक, 1966। विधेयक पर 4 अप्रैल 1967 को राज्य सभा द्वारा विचार किया गया और उसी दिन मूल रूप में पारित कर दिया गया। विधेयक, जैसा कि राज्य सभा द्वारा पारित किया गया था, पर 7 अप्रैल 1967को लोकसभा द्वारा विचार किया गया और पारित किया गया। विधेयक को 10 अप्रैल 1967 को तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन से सहमति मिली। इसे भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया और पारित किया गया। उसी तिथि से लागू हुआ।
साथियों बात अगर हम सिंधी भाषा के 10 रोचक तथ्यों की करें तो, सिंधी भाषा अखंड भारत की प्राचीन भाषा है। यह मूलतः सिंध प्रांत की भाषा है। इस भाषा का प्राचीन इतिहास रहा है। भारत और अब पड़ोसी मुल्क में इस भाषा को बोलने वालों की संख्या अधिक है। सिन्धी भाषा के संबंध में 10 रोचक तथ्य। (1) सिंधी भाषा द्रविड़ भाषाओं की ग्रुप की भाषा है। सिंधी भाषा भारतीय आर्य भाषाओं के पश्चिमोत्तर समूह की भाषा है। (2) सिंधी भाषा की उत्पत्ति वेदों के लेखन या सम्भवतः उससे भी पहले सिन्ध क्षेत्र में बोली जाने वाली भारतीय-आर्य बोली या प्राकृत भाषा से हुई है। प्राचीन सिंधी भाषा में संस्कृत और प्राचीक ने शब्द बहुतायत होते थे।(3) प्राकृत परिवार की अन्य भाषाओं की तरह सिंधी भी विकास के प्राचीन भारतीय – आर्य (संस्कृत) व मध्य भार तीय-आर्य (पालि, द्वितीयक प्राकृत तथा अपभ्रंश) के दौर से गुजरक एक परिपक्व भाषा बनी। संस्कृत और प्राकृत सिन्धी जबान की बुनियाद रही हैं। (5) भाषा का विकृतिकरण तब प्रारंभ हुआ जब बाहरी लोगों का आक्रमण बढ़ा। लगातार तुर्क, ईरान और अरब के आक्रमणों के चलते इस भाषा की लिपि भी बदली और इसमें अरबी एवं फारसी शब्दों की संख्घ्या भी बढ़ती गई। (6) सिंधी भाषा मुख्यतः दो लिपियों में लिखी जाती है, अरबी-सिंधी लिपि तथा देवनागरी- सिंधी लिपि। परंतु इसकी मूली लिपि सिंधी ही है, जिसकी उत्पत्ति आद्य-नागरी, ब्राह्मी और सिंधु घाटी लिपियों से हुई है। (7) जब से भारत का बंटवारा हुआ है सिंध प्रांत ही नहीं पाकिस्तान के हर प्रांत पर ऊर्दू भाषा और अरबी लिपि को थोपा गया जिसके चलते वहां की मूल भाषा अब लुप्त होने की स्थिति में हैँ। पाकिस्तान की चाहें सिंधी भाषा हो, पंजाबी हो या पख्तून। सभी भाषाएं अब पहले जैसी नहीं रही, उनमें फारसी और अरबी के शब्दों की भारमार हो चली है। बंटवारे ने जब इंसानी बस्तियों को अपनी जड़ों से बेदखल किया, तो इसमें नदी, नाले, इमारतें और दरख्त तो वहीं रह गए, मगर जबान इंसान के साथ साथ चली आई तभी आज भारत में सिंधी बंगाली और पंजाबी बच गई। (8) कहते हैं कि सिंध भाषा का जुड़ाव भी महाभारत काल के सिंधु देश और सिंधु घाटी की हड़प्पा और मोहनजोदड़ो संस्कृति से रहा है। सिन्धु घाटी सभ्यता की भाषा द्रविड़ पूर्व (प्रोटो द्रविड़ीयन) भाषा थी। भाषा को लिपियों में लिखने का प्रचलन भारत में ही शुरू हुआ। प्राचीनकाल में ब्राह्मी लिपि और देवनागरी लिपि का प्रचलन था। इसमें ब्रह्मी लिपि इस क्षेत्र की मुख्य लिपि थी।(9) सिंधी भाषा अरबी लिपि स्टाइल से यानि दाएं से बाएं लिखी जाती है। इसमें 52 अक्षर होते हैं। जिसमें 34 अक्षर फारसी भाषा के हैं और 18 नए अक्षर है। अरबी -सिंधी लिपि- 52 वर्ण (अरबी के 28 वर्ण, फारसी के 3 वर्ण), देवनागरी लिपि- हिंदी वर्णमाला से देवनागरी सिंधी वर्णमाला में अधिक वर्ण- ख, ग, ज, फ, ग, ज, ड, ब। गुजराती लिपि- गुजराती लिपि में सिंधी भाषा लिखने की परंपरा पिछली सदी से ही दिखाई देती है। सिंध में थरपारकर ज़िल्हा के लोग इस लिपि का अधिक प्रयोग करते हैं। (10) सिंधी की प्रमुख बोलियों में सिरा इकी, विचोली, लाड़ी, लासी, थरेली या धतकी, कच्छी प्रमुख है। ‘उ’ से समाप्त होने वाले शब्द सिंधी भाषा में प्राचीन प्राकृत मूल से आए हैं। सिंधी भाषा ने कई प्राचीन शब्द और व्याकरण स्वरूपों को सुरक्षित रखा है, जैसे झुरूया से झुरू (प्राचीन), वैदिक संस्कृत के युति से जुई स्थान तथा प्राकृत वुथ्या से वुथ्थो बारिश हुई जैसे शब्द हैं।
साथियों बात अगर हम मातृभाषा के महत्व की करें तो परिवार के सदस्य मातृभाषा का प्रयोग करते हैं क्योंकि वे अपनी मातृभाषा को अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हैं। भाषा उनके लिए संस्कृति, अभिव्यक्ति, समाज, और व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है। वे अपनी मातृभाषा को अपने बच्चों और पीढ़ी से आगे ले जाना चाहते हैं ताकि वे भी अपनी संस्कृति,अभिव्यक्ति समाज, और व्यक्तित्व का प्रति निधित्व कर सकें। भाषा मधुर होने के लिए, उसे सही ढंग से बोलना, सुनना, और लिखना आवश्यक होता है। एक व्यक्ति की भाषा मधुर होती है जब वह उस भाषा के व्याकरण, शब्दावली, वाक्य रचना, और वाक्य विन्यास के नियमों का पूरी तरह से पालन करता है। भाषा का उच्चारण और विभिन्न शब्दों का सही उपयोग भी मधुरता में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, भाषा मधुर होने के लिए, व्यक्ति को भाषा के संचार में सक्षम होना आवश्यक होता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भाषाओं की मिठास -सिंधी भाषा दिवस 10 अप्रैल 2024 पर विशेष। सिंधी भाषा को 1967 के 21 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा, आठवीं अनुसूची में 10 अप्रैल 1967 को जोड़ा गया था। हर समाज की मातृभाषा अपनी संस्कृति अभिव्यक्ति, समाज और व्यक्ति त्व का प्रतिनिधित्व करती है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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