डॉ विजय गर्ग
बचपन के लेकर युवावस्था तक उम्र के हर पड़ाव पर बच्चों की सीखने-समझने की क्षमता बदल जाती है। रुचियों व व्यवहार में परिवर्तन आता है। कई मामलों में संवेदनशीलता पर असर पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि इन चरणों के मुताबिक अभिभावकों का व्यवहार, समझाने व मार्गदर्शन का तरीका भी बदलना चाहिये। परवरिश से जुड़े इन्हीं बदलावों को समझने से जुड़ा है 7-7-7 का नियम।
आमतौर पर बच्चे को बस बच्चा ही समझा जाता है। कहने का अर्थ यह है कि उम्र के हिसाब से बच्चों को भी समझने और समझाने के तौर-तरीके अलग-अलग होने चाहिए, पर होते नहीं हैं। हम भूल ही जाते हैं कि आयु के हर पड़ाव पर बालमन का मौसम भी बदल जाता है। बढ़ते बच्चों की सीखने की क्षमता बदलती है। उनकी संवेदनशीलता पर असर पड़ता है। रुचि-रुझान बदल जाते हैं। व्यवहार में परिवर्तन आता है। परवरिश से जुड़े इन्हीं बदलावों को समझने से जुड़ा है 7-7-7 का रूल। पैरेंटिंग का एक प्यारा सा नियम जिसमें सहजता से बच्चों के पालन-पोषण को तीन पड़ावों में बांटा गया है। इस नियम के तहत 0-7 से सात वर्ष की आयु खेलने-कूदने के लिए तो 7-14 के एजग्रुप को पढ़ाने-समझाने के लिए रखा गया है। बड़े होते बच्चों के लिए इससे आगे के वर्षों यानि 14-21 साल की उम्र को मार्गदर्शन देने से जोड़ा गया है। असल में तीनों ही स्टेज अभिभावकों के लिए बच्चों की उम्र के अनुसार उनके साथ व्यवहार करने, सिखाने-पढ़ाने और मन-जीवन को दिशा देने का सबक लिए हैं।
लाइफ स्किल्स का संतुलन
पहला पड़ाव बचपन को पूरी मासूमियत के साथ जीने से जुड़ा है। खेलकूद और सब कुछ नया सीखने के रोमांच वाला यह समय जीवन कौशल के जुड़ी प्यारी बातें जानने-समझने का भी दौर होता है। इस समय बच्चे बोलना सीखते हैं। अपनों को पहचानने की समझ आती है। आसपास की चीजों को जानने की जिज्ञासा उनके मासूम मन में पलने लगती है। जिसके चलते बच्चे सवाल पूछना सीखते हैं। दोस्त बनाते हैं। बहुत से मानवीय भावों को समझने का प्रयास करते हैं । 0-7 से सात वर्ष की आयु का समय अभिभावकों के लिए भी बहुत प्यारा समय होता है। बच्चे खुशी और भय जैसे इमोशन्स को फील करने लगते हैं । वे इस समय अंधेरे या अकेलेपन से डरने लगते हैं। किसी चीज़ के टूटने-फूटने से पड़ने वाली डांट से भी भयभीत रहते हैं। इस आयुवर्ग में बच्चे को हर बात में बड़ों यानी दूसरों का अनुसरण करना आ जाता है। मानवीय व्यवहार के कौशल सीखने के साथ ही यह समय बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की बुनियाद बनाने का भी होता है। हंसी-खुशी उनके बचपन को जीते हुए स्वस्थ खानपान और अच्छे से बोलने, चलने और अपने परिवेश को समझने की सीख देने का सुंदर पड़ाव है।
समझ और संवेदनशीलता पोसने का पड़ाव
7-14 के एजग्रुप को पढ़ने और सही समझ विकसित करने के लिए रखा गया है। यही साल बच्चों के एकेडेमिक रुझान को समझने के भी होते हैं। पढ़ाई के प्रति गंभीरता को दिशा देने का समय उनके जीवन से जुड़ी कई बातों को लेकर सही समझ पैदा करने का भी है। अध्ययन बताते हैं कि नौ से 12 साल की उम्र के बीच बच्चों में लीडरशिप और आगे रहने की भावना बढ़ने लगती है। खेल हो या पढ़ाई- किसी फ्रंट पर पीछे रह जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। अपनी तकलीफ साझा करना सीखते हैं तो पैरेंट्स और टीचर्स से गहराई से जुडते हैं। मूड स्विंग्स के अलावा इस समय वे इमोशनली भी आसानी से आहत हो जाते हैं। ऐसे में अभिभावक सीधे-सीधे कोई नेगेटिव रिएक्शन ना दें। सहजता के साथ अपनी बात समझाएं। बच्चों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहें। साथ ही बच्चों के मन में भी मानवीय संवेदनाएं पोसें। यह उम्र घर के बड़े-बुजुर्गों से जुड़ने, उनकी मदद करने और रिश्तेदारों से जुड़ाव बनाने के लिए भी बहुत अहम है।
मार्गदर्शन और मनोबल बढ़ाने का दौर
14-21 बच्चों को सही मार्गदर्शन देने वाला दौर होता है। इस दौरान वे टीनएज से एडल्टहुड में प्रवेश करते हैं । इसीलिए यह आयुवर्ग बहुत हद तक स्पष्ट-सधी सलाहें देने का भी है। यह पढ़ाई के लिए घर से बाहर निकलने और दुनिया देखने का शुरुआती पड़ाव होता है। ऐसे में बच्चों के साथ नियमित संवाद रखना भी आवश्यक है। अध्ययन भी बताते हैं कि 13 से 16 साल की उम्र बहुत से अहम बदलावों का पड़ाव होता है। इस दौरान बच्चे ना केवल कैरियर और एकेडेमिक बेहतरी की चिंता से घिर जाते हैं बल्कि शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर भी बहुत से बदलावों से जूझते हैं। बच्चे खुद अपने व्यक्तित्व को लेकर जागरूक हो जाते हैं। तार्किक-व्यावहारिक रूप से जीवन से जुड़े पहलुओं को समझने का भाव आने लगता है। समाज, परिवार या फ्रेंड सर्कल में अपनी जगह, अपनी पहचान के मायने समझने लगते हैं। यह जीवन की बुनियाद बनाने वाला एक निर्णायक चरण है। साथ ही भावनात्मक रूप से टूटने का जोखिम भरा पड़ाव भी। किसी से सहज लगाव, प्रेम-प्रसंग, पढ़ाई में पीछे छूटने या अकेले पड़ जाने से जीवन से हारने मामले भी इस उम्र में ज्यादा होते हैं। इस चुनौतीपूर्ण समय में अभिभावकों का भावनात्मक समर्थन बहुत जरूरी होता है। इन वर्षों में बच्चों के प्रभावी व्यक्तित्व, सधी-स्वस्थ जीवनशैली और मजबूत संवेदनाओं को खाद-पानी देने की आवश्यकता होती है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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