बृजेश चतुर्वेदी
भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा लाए गए ‘संचार साथी’ ऐप और उसके प्रमुख फीचर ‘चक्षु’ पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। जहाँ एक ओर सरकार इसे डिजिटल सुरक्षा की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर, ऐप की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारियाँ और इसकी अनिवार्यता पर DoT का निर्देश इसकी भूमिका को सुरक्षा उपकरण से कहीं अधिक राज्य-प्रायोजित निगरानी (State-Sponsored Surveillance) के रूप में संदेह के घेरे में ला खड़ा करते हैं।
यह विवाद तब और गहरा गया जब DoT ने स्मार्टफोन निर्माताओं से ‘संचार साथी’ ऐप को सभी नए उपकरणों में प्री-इंस्टॉल करने और पुराने फोनों में भी अपडेट के माध्यम से उपलब्ध कराने के लिए कहा, साथ ही यह भी निर्दिष्ट किया कि उपयोगकर्ता इसे डिलीट न कर पाएँ।
चक्षु की सीमाएँ: ‘सुरक्षा’ का खोखला दावा
संचार साथी ऐप का मुख्य आकर्षण ‘चक्षु’ फीचर है, जिसे ‘फ्रॉड पहचानने का टूल’ कहा जा रहा है। हालाँकि, इसकी आधिकारिक वेबसाइट यह स्पष्ट करती है कि:
* वित्तीय ठगी या साइबर अपराध की शिकायत के लिए ‘चक्षु’ एक सुविधा नहीं है।
इससे स्पष्ट है कि ‘चक्षु’ केवल संभावित धोखाधड़ी वाले कॉल, SMS या WhatsApp संदेशों की रिपोर्टिंग के लिए है। असली अपराध होने, या वित्तीय नुकसान हो जाने पर, ऐप की भूमिका लगभग शून्य है। ऐसे में, यह बड़ा सवाल उठता है कि यदि यह ऐप साइबर सुरक्षा के सबसे महत्वपूर्ण पहलू—आर्थिक नुकसान—में नागरिक की मदद नहीं कर सकता, तो 100 करोड़ मोबाइल में इसे जबरन डलवाने का उद्देश्य सुरक्षा से अधिक क्या है? विपक्ष का तर्क है कि यह मंशा जासूसी के सिवा कुछ और नहीं हो सकती।
जरूरत से ज्यादा परमीशन और प्राइवेसी का हनन
यह संदेह और भी पुख्ता हो जाता है जब हम ऐप द्वारा माँगी जा रही अनुमतियों (Permissions) की सूची पर गौर करते हैं। ‘संचार साथी’ कई ‘खतरनाक’ (Dangerous) परमीशन की मांग करता है, जिनमें शामिल हैं:
* android.permission.SEND_SMS: SMS भेजने की अनुमति, जिससे वित्तीय लागत आ सकती है।
* android.permission.READ_SMS: फ़ोन पर स्टोर किए गए SMS या MMS पढ़ने की अनुमति, जिससे गोपनीय जानकारी लीक हो सकती है।
* android.permission.READ_CALL_
* android.permission.READ_PHONE_
* android.permission.WRITE_
किसी भी ऐप को प्री-इंस्टॉल करने और उसे डिलीट न करने देने की ज़िद, साथ ही इतने व्यापक डेटा तक पहुँच की मांग करना, यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सरकार केवल खोए हुए फोन को खोजने या फ्रॉड रोकने से अधिक, नागरिकों की निजता में घुसपैठ करने में दिलचस्पी रखती है। आलोचकों का तर्क है कि एक ऐसा ऐप जो कैमरा, माइक, लोकेशन, कीबोर्ड और कॉल लॉग तक आधिकारिक तौर पर सुनने-देखने लगे, वह नियंत्रण स्थापित करने का एक माध्यम बन जाता है।
उपयोगकर्ता रेटिंग: सीमित प्रभावशीलता की कहानी
उपलब्ध डेटा के अनुसार, ऐप को 14,826 समीक्षाओं के विश्लेषण पर औसत 4.4 की रेटिंग मिली है, जिसमें 85% उपयोगकर्ता संतुष्ट हैं। हालाँकि, समीक्षाओं में 11% (1636) गंभीर समस्याएँ (Issues Reported) भी दर्ज की गई हैं।
संतुष्टि की उच्च रेटिंग के बावजूद, ऐप की मुख्य सीमाएँ—जैसे कि गंभीर साइबर अपराधों के लिए अक्षमता—बनी हुई हैं। समीक्षा डेटा यह पुष्टि करता है कि ऐप कुछ बुनियादी स्तर की सहायता प्रदान कर सकता है (जैसे खोए हुए फोन को ट्रैक करना), लेकिन समीक्षाओं की मात्रा में वृद्धि (विशेषकर नवंबर 2025 के अंत में एक महत्वपूर्ण वृद्धि) और 11% गंभीर रिपोर्ट किए गए मुद्दे, इसकी पूर्ण प्रभावशीलता और विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करते हैं।
निरंकुशता की राह पर भारत?
आलोचक इस कदम की तुलना रूस के निरंकुश शासन से कर रहे हैं, जहाँ 1 सितंबर 2025 को सरकार नियंत्रित मैसेजिंग मैनेजमेंट ऐप ‘MAX’ को प्री-इंस्टॉल करना अनिवार्य कर दिया गया था। रूस में यह ऐप सुरक्षा एजेंसी FSB को लोगों के कॉल, लोकेशन, टेक्स्ट मैसेज और सोशल मीडिया डेटा तक पहुँच प्रदान करता है।
भारत में भी, निरंकुश सत्ता के आरोप के बीच, यह कदम ‘जासूसी’ की आशंकाओं को जन्म देता है। पहले से ही NATGRID जैसे डेटाबेस की समीक्षा और हाल ही में संशोधित DPDP एक्ट के नियम 23, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी भी सेवा प्रदाता से सारा डेटा मांगने की शक्ति देते हैं, ने इन आशंकाओं को और बल दिया है।
संचार साथी ऐप को अनिवार्य बनाने का निर्णय लोकतंत्र में एक खतरनाक मिसाल कायम करता है। यदि ऐप वास्तविक साइबर सुरक्षा में सीमित भूमिका निभाता है, लेकिन गोपनीयता के लिए ‘खतरनाक’ अनुमतियाँ मांगता है, और उसे डिलीट करने पर प्रतिबंध लगाता है, तो यह स्पष्ट है कि इसका मकसद नागरिक सुरक्षा से कहीं अधिक सार्वभौमिक निगरानी है। एक लोकतांत्रिक देश में, सरकार द्वारा हर नागरिक को ट्रैक करने के लिए जबरन ऐसा उपकरण डालना, नागरिकों की स्वतंत्रता और गोपनीयता के अधिकार पर एक सीधा हमला है। सरकार को या तो अपनी मंशा साफ करनी होगी, या इस निरंकुश निर्देश को तुरंत वापस लेना होगा।
“सुरक्षा का सरकारी दावा, मगर प्राइवेसी पर ताला—’संचार साथी’ की असली कहानी”
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