“घबराहट के पार…”
एक अजब सी घबराहट है —
पाकिस्तानी शहरों के भीतर,
दीवारों पर उभरे डर के धब्बे
अब लाउडस्पीकर से भी ऊँचे बोलने लगे हैं।
झेलम, चिनाब और सिंधु की लहरें
अब लोरी नहीं सुनातीं —
वे छुपा रही हैं उस मुल्क की बेचैनी
जिसे अपने ही झूठ से नफ़रत हो गई है।
दुनिया देख रही है —
कुछ बदलने वाला है।
पीओके का नक्शा नहीं,
सोच बदलने वाली है।
वो जो बंदूकें लेकर चलते हैं
उनकी उंगलियाँ अब काँपती हैं,
क्योंकि हिंदुस्तान की चुप्पी
अब शोर बन चुकी है।
सेना हमारी नारे नहीं,
निर्णय लेकर चलती है,
वो दुश्मन को मारती नहीं,
उसकी चालें थका देती है।
तुम साजिश करोगे —
हम शौर्य लिखेंगे।
तुम ललकारोगे —
हम सरहद को माँ बना देंगे।
हिंदुस्तान की फौज
किसी शौर्यगाथा की गूंज नहीं,
वो सर्द रातों में देश के सपनों की रखवाली है।
जय हिंद।
— डॉ सत्यवान सौरभ
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