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पारदर्शिता की पहल, पर एकरूपता के अभाव में अदालतों तक पहुंचते कर्मचारी

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(आदर्श ऑनलाइन स्थानांतरण नीति विशेष)

पारदर्शिता की पहल, पर एकरूपता के अभाव में अदालतों तक पहुंचते कर्मचारी

(सभी कर्मचारियों की एकमुश्त अनिवार्य सहभागिता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि कार्यस्थल वरिष्ठता निष्पक्ष रूप से निर्धारित हो और भविष्य में किसी प्रकार की असमानता या भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो। ऑनलाइन स्थानांतरण नीति लागू होने के बाद पारंपरिक स्थानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। सभी विभागों में समान कार्यकाल व्यवस्था लागू हो, जिससे कर्मचारियों को समान अवसर मिल सकें। नई नियुक्तियों को समयबद्ध रूप से ऑनलाइन प्रणाली में शामिल किया जाए, ताकि वरिष्ठता प्रभावित न हो। स्थानांतरण प्रक्रिया का निश्चित वार्षिक कार्यक्रम हो, जिससे पारदर्शिता बढ़े और कर्मचारियों में अनिश्चितता समाप्त हो।)

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा सरकार द्वारा लागू की गई आदर्श ऑनलाइन स्थानांतरण नीति प्रशासनिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण और साहसिक कदम है। लंबे समय से सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण को लेकर मनमानी, सिफारिश, पक्षपात और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती रही हैं। इन समस्याओं को समाप्त करने और प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष तथा योग्यता आधारित बनाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्थानांतरण व्यवस्था लागू की गई। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कर्मचारियों को उनकी वरिष्ठता, सेवा अवधि और विशेष परिस्थितियों के आधार पर न्यायपूर्ण तरीके से कार्यस्थल आवंटित किया जाए तथा किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप की संभावना समाप्त हो।

यह नीति आधुनिक प्रशासनिक सोच और तकनीकी उपयोग का सकारात्मक उदाहरण है। 50 या उससे अधिक पदों वाले संवर्गों पर लागू इस व्यवस्था में 80 अंकों का योग्यता आधारित मूल्यांकन तंत्र निर्धारित किया गया है। इसमें आयु और कुल सेवा अवधि को प्रमुख आधार बनाया गया है, जिससे वरिष्ठता को उचित महत्व मिल सके। सेवा अवधि को 365 दिनों से विभाजित कर अंक निर्धारित किए जाते हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी बनती है। महिला कर्मचारियों को 10 अंक, पति–पत्नी मामलों में 5 अंक तथा गंभीर बीमारी या दिव्यांगता के मामलों में 10 से 20 अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं।

पूरी प्रक्रिया मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली से जुड़े ऑनलाइन मंच के माध्यम से संचालित होती है। अधिसूचना जारी होने के बाद संवर्ग सूची सार्वजनिक की जाती है और कर्मचारी एकमुश्त पासवर्ड के माध्यम से सत्यापन कर अपने पसंदीदा कार्यस्थलों का चयन करते हैं। निर्धारित समय में विकल्प प्रस्तुत न करने की स्थिति में कर्मचारी को किसी भी स्थान पर नियुक्त किया जा सकता है। अतिरिक्त पदों पर कार्यरत कर्मचारियों का स्थानांतरण अनिवार्य रूप से किया जाता है तथा आदेश जारी होने के निर्धारित समय के भीतर कार्यभार ग्रहण करना आवश्यक होता है।

नीति लागू होने के बाद कई विभागों में पारदर्शिता बढ़ी है और शिकायतों में कमी भी आई है। ऑनलाइन शिकायत निवारण तंत्र ने कर्मचारियों को अपनी बात रखने का मंच दिया है। इससे यह विश्वास मजबूत हुआ है कि अंकीय प्रणाली के माध्यम से प्रशासनिक सुधार प्रभावी रूप से लागू किए जा सकते हैं।

फिर भी, नीति के क्रियान्वयन में एकरूपता का अभाव इसकी सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। सभी विभागों में समान कार्यकाल, समान समय-सारिणी और समान नियम लागू नहीं हैं। कहीं न्यूनतम कार्यकाल अलग है, कहीं अधिकतम कार्यकाल की सीमा भिन्न है, तो कहीं विशेष परिस्थितियों की परिभाषा बदल जाती है। इससे समान संवर्ग के कर्मचारियों के बीच असमानता उत्पन्न होती है और नीति की मूल भावना प्रभावित होती है।

ऑनलाइन स्थानांतरण अभियान की पहली ही प्रक्रिया में सभी कर्मचारियों की एकमुश्त अनिवार्य सहभागिता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि प्रारंभिक चरण में कुछ कर्मचारी किसी कारणवश बाहर रह जाते हैं, तो उनकी कार्यस्थल वरिष्ठता प्रभावित होती है और भविष्य में विवाद की स्थिति बनती है। इसलिए “एक बार की अनिवार्य सहभागिता” के माध्यम से सभी कर्मचारियों को समान आधार पर लाना चाहिए।

सभी विभागों में निर्धारित कार्यकाल समान होना चाहिए। उदाहरण के लिए न्यूनतम कार्यकाल एक वर्ष या एक स्थानांतरण अभियान से अगले अभियान तक तथा अधिकतम कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित किया जा सकता है। इससे कोई भी कर्मचारी अत्यधिक लंबे समय तक एक ही स्थान पर नहीं रहेगा और न ही किसी को अल्प अवधि में बार-बार स्थानांतरण झेलना पड़ेगा।

जब भी नई नियुक्ति हो, उसे अनिवार्य रूप से अगले स्थानांतरण अभियान में शामिल किया जाना चाहिए। यदि ऑनलाइन स्थानांतरण नीति लागू होने के बाद अब तक कोई कर्मचारी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हुआ है, तो उसे वर्तमान अभियान में अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाना चाहिए। इससे सभी कर्मचारियों को उनकी वरिष्ठता के आधार पर कार्यस्थल प्राप्त करने का अवसर मिलेगा और मनमानी या रिश्वतखोरी के माध्यम से पारंपरिक आदेशों द्वारा कार्यस्थल प्राप्त करने की प्रवृत्ति समाप्त होगी।

सभी विभागों में स्थानांतरण अभियान एक ही समय पर पूरा किया जाना चाहिए। इससे पति–पत्नी प्रकरणों में निर्णय लेने में सुविधा होगी और परिवारों को अनिश्चितता का सामना नहीं करना पड़ेगा। यदि विभिन्न विभाग अलग-अलग समय पर स्थानांतरण करेंगे, तो पारिवारिक समन्वय कठिन हो जाता है।

कार्यकाल की गणना करते समय वित्तीय वर्ष को एक वर्ष माना जाना चाहिए, न कि दिनों की गणना के आधार पर। कई बार स्थानांतरण अभियान वित्तीय वर्ष के मध्य में पूरा होता है और कार्यभार ग्रहण वर्ष के अंतिम चरण में होता है, जिससे कार्यकाल की गणना में एक वर्ष का अंतर उत्पन्न हो जाता है। यदि वित्तीय वर्ष को पूर्ण इकाई के रूप में स्वीकार किया जाए, तो कट-ऑफ तिथि से संबंधित विवाद समाप्त हो सकते हैं।

हर वर्ष एक निश्चित और पूर्व घोषित समय-सारिणी के अनुसार स्थानांतरण अभियान चलाया जाना चाहिए। यदि यह प्रक्रिया नियमित और वार्षिक हो, तो कर्मचारियों में अनिश्चितता समाप्त होगी और प्रशासनिक समन्वय बेहतर होगा। अनियमित या विलंबित अभियान से भ्रम और असंतोष की स्थिति उत्पन्न होती है।

पद पुनर्संरचना या युक्तिकरण की प्रक्रिया के दौरान, यदि अगली भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी हो, तो न्यूनतम पदों को अवरुद्ध किया जाना चाहिए ताकि कर्मचारियों को अपने निवास स्थान के निकट कार्यस्थल मिलने की अधिक संभावना रहे। यदि एक बार सभी कर्मचारियों को शामिल कर व्यापक स्तर पर युक्तिकरण किया जाए, तो भविष्य में बार-बार इस प्रक्रिया की आवश्यकता भी नहीं रहेगी।

वर्तमान में कई कर्मचारियों के नियुक्ति आदेशों में “अनिवार्य सहभागिता” का स्पष्ट उल्लेख है, किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि यदि कोई कर्मचारी किसी कारणवश अभियान में भाग नहीं ले पाता, तो उसकी कार्यस्थल वरिष्ठता और अधिकारों का संरक्षण कैसे होगा। इस अस्पष्टता के कारण कई कर्मचारी प्रक्रिया से बाहर रह गए, जिससे असमानता और असंतोष की स्थिति उत्पन्न हुई।

सबसे गंभीर चिंता यह है कि ऑनलाइन नीति लागू होने के बाद भी कुछ स्थानांतरण पारंपरिक माध्यम से किए गए हैं। यह स्थिति नीति की पारदर्शिता और निष्पक्षता के विपरीत है। जब कुछ कर्मचारियों को अंकीय आधार पर और कुछ को पारंपरिक आदेशों से कार्यस्थल दिए जाते हैं, तो समान अवसर का सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है। ऐसी समानांतर व्यवस्था नीति को संदेह के दायरे में लाती है और कर्मचारियों के बीच भेदभाव की भावना उत्पन्न करती है।

इन्हीं विसंगतियों के कारण अनेक कर्मचारी न्यायालयों की शरण लेने को विवश हो रहे हैं। समान पद और समान सेवा अवधि के बावजूद अलग-अलग व्यवहार से विवाद उत्पन्न होना स्वाभाविक है। न्यायालयी प्रक्रिया कर्मचारियों के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से कठिन होती है, साथ ही प्रशासन पर भी अतिरिक्त बोझ डालती है।

यदि नीति को पूर्णतः एकरूप और अनिवार्य रूप से लागू किया जाए, सभी कर्मचारियों की एकमुश्त सहभागिता सुनिश्चित की जाए तथा पारंपरिक स्थानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए, तो न्यायालयों में जाने की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाएगी। इससे कर्मचारियों का विश्वास मजबूत होगा और प्रशासनिक प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ेगी।

आदर्श ऑनलाइन स्थानांतरण नीति एक दूरदर्शी पहल है, परंतु इसकी सफलता पूर्ण पारदर्शिता, समान नियम और कठोर अनुपालन पर निर्भर करती है। जब तक सभी विभागों में समान कार्यकाल, समान वार्षिक कार्यक्रम, अनिवार्य सहभागिता और केवल ऑनलाइन माध्यम से ही कार्यस्थल आवंटन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक इसकी मूल भावना अधूरी रहेगी।

आज आवश्यकता है कि इस नीति को और अधिक स्पष्ट, सशक्त और एकरूप बनाया जाए। यदि ऐसा किया जाता है, तो यह व्यवस्था न केवल हरियाणा में, बल्कि पूरे देश में सुशासन, पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रशासन का आदर्श उदाहरण बन सकती है।

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