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स्वयं सहायता समूह से सशक्तिकरण तक: बड़वा की जूती की गूँज देशभर में

News-Desk by News-Desk
February 18, 2026
in देश
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स्वयं सहायता समूह से सशक्तिकरण तक: बड़वा की जूती की गूँज देशभर में




(स्वरोजगार अपनाकर गाँव की चौखट से डिजिटल मंच तक पहुँची सफलता की कहानी।) 

खंड कार्यक्रम प्रबंधक, सिवानी, जगबीर सिंह वर्मा ने बताया कि भारत सरकार एवं हरियाणा सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित हरियाणा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब परिवारों, विशेषकर महिलाओं, को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना है। सिवानी खंड में 402 महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया है, जिनसे लगभग 4000 महिलाएँ जुड़ी हैं। इन समूहों के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता तथा सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं। पिछले आठ वर्षों में अनेक महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार हुआ है और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है। स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने अपना व्यक्तिगत ब्रांड “अर्बनिकइंडिया” नाम से तैयार किया है, जिसके उत्पाद अब ऑनलाइन माध्यम से भी खरीदे जा सकते हैं।

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

हरियाणा की धरती परंपरा, परिश्रम और हुनर की अनमोल विरासत से समृद्ध रही है। यहाँ के गाँव केवल कृषि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हस्तकला और पारंपरिक कौशल की जीवंत पहचान भी हैं। भिवानी जिले के सिवानी क्षेत्र के बड़वा गाँव की कारीगर कांता देवी ने इसी परंपरा को अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। आज उनकी बनाई हुई जूतियाँ गुरुग्राम में आयोजित सरस आजीविका मेले में ग्राहकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। यह सफलता केवल एक महिला की उपलब्धि नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण और पारंपरिक कला के पुनर्जागरण की प्रेरक कहानी है।

कांता देवी का जीवन संघर्ष, समर्पण और संकल्प का उदाहरण है। उनका विवाह ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ जूती निर्माण की कला पीढ़ियों से चली आ रही थी। उनके ससुर भाना राम इस पारंपरिक कार्य से जुड़े हुए थे और उनके पति भी इस काम में सक्रिय भूमिका निभाते थे। विवाह के बाद कांता देवी ने इस कला को केवल परंपरा के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे अपनी पहचान और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाया। उन्होंने इस कार्य को आगे बढ़ाने का निश्चय किया और पूरी लगन से इसमें जुट गईं।

शुरुआत में कांता देवी गाँव में ही जूतियाँ बनाकर बेचती थीं। सीमित संसाधन, छोटा बाजार और कम आय जैसी कई चुनौतियाँ उनके सामने थीं। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनके पति ने उनका पूरा सहयोग किया और गाँव में दुकान संभालकर इस व्यवसाय को मजबूत आधार दिया। यह पारिवारिक सहयोग उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत बना। धीरे-धीरे उन्होंने अपने कौशल को निखारा और पारंपरिक डिजाइनों के साथ आधुनिक डिजाइनों को भी शामिल करना शुरू किया।

लगभग दस वर्ष पहले कांता देवी ने लक्ष्मीबाई महिला स्वयं सहायता समूह का गठन किया। इस समूह के माध्यम से उन्होंने गाँव की अन्य महिलाओं को भी इस कार्य से जोड़ा। यह पहल केवल रोजगार का माध्यम नहीं बनी, बल्कि महिला सशक्तिकरण का एक मजबूत उदाहरण भी बनी। इस समूह से जुड़कर महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता मिली और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया। आज यह समूह कई महिलाओं के लिए स्थायी आय का स्रोत बन चुका है।

समय के साथ कांता देवी ने अपने उत्पादों को एक नई पहचान देने के लिए “अभिनिक इंडिया” नाम से अपना ब्रांड स्थापित किया। यह कदम उनके व्यवसाय के विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ। इस ब्रांड के माध्यम से उनकी जूतियाँ स्थानीय बाजार से निकलकर बड़े शहरों और राष्ट्रीय स्तर के मेलों तक पहुँचने लगीं। उनके बेटे ने ऑनलाइन बिक्री की जिम्मेदारी संभाली, जिससे उनके उत्पाद डिजिटल प्लेटफॉर्म तक भी पहुँच गए। आज उनके पास 100 से अधिक डिजाइनों का संग्रह है, जो पारंपरिक कला और आधुनिक फैशन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

उनकी जूतियों की कीमत 350 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक है और उनका मासिक कारोबार लगभग तीन लाख रुपये तक पहुँच चुका है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि यदि ग्रामीण उत्पादों को सही मंच और अवसर मिले, तो वे आर्थिक रूप से अत्यंत सफल हो सकते हैं। यह सफलता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान की भी कहानी है।

इस उपलब्धि में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस मिशन के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और बाजार उपलब्ध कराया जाता है। इसी मंच के माध्यम से कांता देवी को सरस मेले में अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिला। सरस मेला ग्रामीण कारीगरों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है, जहाँ उन्हें अपने हुनर को बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।

भिवानी जिले के एक छोटे से गाँव से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचना आसान नहीं था। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, परिवार का सहयोग और आत्मविश्वास की शक्ति थी। उनके ससुर भाना राम द्वारा शुरू की गई इस पारंपरिक कला को कांता देवी और उनके पति ने मिलकर आगे बढ़ाया और इसे आधुनिक पहचान दिलाई। यह परंपरा और नवाचार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

इस सफलता का सामाजिक प्रभाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और समाज में उनका सम्मान भी बढ़ता है। वे परिवार के निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभाने लगती हैं और अपने बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में योगदान देती हैं। कांता देवी की सफलता ने गाँव की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित किया है कि वे अपने कौशल का उपयोग कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं।

यह सफलता ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब गाँव में ही रोजगार उपलब्ध होता है, तो लोगों को शहरों की ओर पलायन करने की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे ग्रामीण समाज में स्थिरता और समृद्धि आती है। यह आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

हरियाणा जैसे राज्यों में पारंपरिक हस्तकला की अपार संभावनाएँ हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन कारीगरों को उचित प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जाए। यदि सरकार और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो ग्रामीण हस्तकला न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना सकती है।

कांता देवी की यात्रा हमें यह सिखाती है कि सफलता के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि मजबूत संकल्प और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि व्यक्ति अपने कौशल पर विश्वास रखे और मेहनत करे, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है।

आज कांता देवी केवल एक कारीगर नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी हैं। उन्होंने यह दिखाया है कि पारंपरिक कला केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का आधार भी है। उनके पति और ससुर के सहयोग से शुरू हुई यह यात्रा आज राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है।

अंततः, बड़वा गाँव की जूतियों की यह सफलता केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की उपलब्धि है। यह कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि यदि ग्रामीण हुनर को सही मंच और सम्मान मिले, तो वह न केवल आर्थिक समृद्धि ला सकता है, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत कर सकता है। कांता देवी की यह यात्रा आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपने हुनर पर गर्व करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती रहेगी।

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