बनावटी तस्वीरों से बढ़ता अवसाद
सामाजिक आयोजन, पारिवारिक समारोह, सांस्कृतिक सम्मेलन या व्यक्तिगत भेंट | सुखद वाकया हो या किसी के संसार छोड़ जाने का पीड़ादायी प्रसंग | सब कुछ तस्वीरों तक सिमट रहा है। छवियां, जो कभी स्मृतियां सहेजने का माध्यम समझी जाती थीं, अब साझे पलों को वर्चुअल संसार में साझा करने के उद्देश्य से ली जाने लगी हैं। संवाद का दायरा घटा है तो लोग डिजिटल मेकअप के भी लती हो रहे हैं। तकलीफदेह है कि फिल्टर यानी तस्वीर को सुंदर बनाने की तकनीक का इस्तेमाल करने की आदत अवसाद के घेरे में भी ला रही है।
वस्तुतः तकनीकी सुविधाओं से मिला नकलीपन ओढ़ने का यह व्यवहार कई मोच पर पीड़ादायी भी बन गया है। लोगों पर आम आयोजनों में भी सज-धजकर पहुंचने का मानसिक दबाव बढ़ा है। हर पल चौकन्ने रहने की एक बाध्यता मिलने-बैठने की सहजता पर भारी पड़ रही है। हर पल को कैमरे में कैद करने की मनोवृत्ति ने सामाजिकता के भाव को ही बदल दिया है। फिल्टर्ड तस्वीरों ने अपने ही चेहरे की असली छवि भुला दी है। हर आयु वर्ग के लोग इस वर्चुअल निखार- संवार के जाल में फंस रहे हैं। कुछ समय पहले गूगल द्वारा किए गए एक वैश्विक अध्ययन में सामने आया था कि अच्छी सेल्फी लेने के लिए अमेरिका और भारत में फिल्टर इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है। अध्ययन के मुताबिक भारतीय महिलाएं अपनी तस्वीरों को सुंदर बनाने के लिए अधिक उत्साहित रहती हैं। इसके लिए वे कई फिल्टर एप और एडिटिंग माध्यमों का इस्तेमाल करती हैं।
विडंबना यह भी है कि मेल-मुलाकात की यादगार के तौर पर ली जा रही तस्वीरें वास्तव में याददाश्त को कमजोर करने लगी हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार लोग सोचते हैं कि फोटो लेने उन्हें कुछ बेहतर याद रखने में मदद मिलेगी, लेकिन वास्तव में यह बिल्कुल विपरीत है। अध्ययनकर्ता जूलिया सोरोस का कहना है कि ‘मैं यह नहीं कह रही हूं कि लोगों को कभी भी तस्वीरें नहीं लेनी चाहिए, लेकिन उन्हें ऐसा कब करना चाहिए इसके प्रति सजगता आवश्यक है।’ बावजूद इसके सब कुछ दूसरों तक पहुंचाने की रुग्ण मानसिकता के चलते मृतक स्वजन के साथ तस्वीरें लेकर इंटरनेट मीडिया पर डालने के उदाहरण भी कम नहीं। सब कुछ स्क्रीन में सहेजने की आदत दुर्घटनाओं का भी कारण बन रही है। हार्वर्ड सहित अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों के शोध बताते हैं कि एक तस्वीर लेने की इच्छा उसी तस्वीर को इंटरनेट मीडिया मंचों पर साझा करने की इच्छा से और बढ़ जाती है। समझना कठिन नहीं कि अपने असली व्यक्तित्व के बजाय फिल्टर्ड छवियों में सुंदर दिखने की चाहत इस लत को और बढ़ाती है। मौजूदा दौर में तकनीक के सधे – सार्थक इस्तेमाल की समझ ही इस खुद आमंत्रित किए जा रहे अवसाद से हमें बचा सकती है।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब













