भारत में अस्थमा रोगियों की संख्या प्रति वर्ष बढ़ती जा रही है। वैश्विक अस्थमा रपट के मुताबिक यहां साढ़े तीन करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं । जबकि अपनी लापरवाही और ठीक से उपचार न होने के कारण हजारों मरीजों की प्रति वर्ष मौत हो जाती है। दरअसल, सिगरेट और तंबाकू का सेवन करने वालों को इस रोग का खतरा तो होता ही है, लेकिन इन दिनों देश में बढ़ रहा वायु प्रदूषण भी एक बड़ा कारक है। इससे लोगों के फेफड़े कमजोर हो रहे हैं। हालांकि अत्यधिक तापमान सांस संबंधी बीमारियां पैदा कर सकता है। वहीं पर्यावरण में आ रहे बदलाव अस्थमा के लक्षण बढ़ा सकते हैं। कई बार तो यह बहुत जटिल बीमारी बन जाती है। ऐसे में मरीज कई बार तो इलाज से भी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते।
इसलिए चिकित्सकों की यही राय होती है कि अस्थमा का उपचार समय रहते करा लेना चाहिए । अगर समुचित इलाज न हो, तो न केवल सर्दी में, बल्कि साल भर मरीज अस्थमा की वजह से परेशान रहता है । जरा- सा बोझ उठाने और सीढ़ियां चढ़ने से उसकी सांस फूलने लगती है।
क्या है बड़ी वजह
कोई भी व्यक्ति एकदम से अस्थमा की चपेट में नहीं आता। मगर सबसे बड़ा कारण यही है कि अगर कोई सिगरेट-बीड़ी पी रहा है या तंबाकू का सेवन कर रहा है, तो वह एक तरह से अपने फेफड़े को जोखिम में डाल रहा है। उसे यह नहीं पता कि किसी दिन वह दमा का मरीज बन जाएगा। दूसरी वजह घर-बाहर किसी भी तरह की धूल- मिट्टी और पशु-पक्षियों के बालों से समस्या की शुरुआत हो सकती है। वहीं पिछले दो- तीन दशकों में शहरों और महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण ने अस्थमा रोगियों की संख्या बढ़ाई है।
लक्षणों पर नजर
अस्थमा रोगी प्रायः शुरुआती लक्षणों पर गौर नहीं करते। नतीजा यह कि एक दिन स्थिति गंभीर हो जाती है। ‘ग्लोबल अस्थमा नेटवर्क’ के मुताबिक शुरुआती लक्षणों वाले 82 फीसद और गंभीर अस्थमा वाले 70 फीसद मरीजों का पता नहीं चलता। यानी ये लापरवाही कर रहे होते हैं। बहुत कम रोगी ही ‘इन्हेलेशन थेरेपी’ का उपयोग करते हैं। वैसे हर व्यक्ति के अस्थमा के लक्षण अलग- अलग होते हैं। सामान्य रूप से एलर्जी से अस्थमा होने का पता चलता है। सांस लेने में कठिनाई, सीने में जकड़न और सांस छोड़ते समय घरघराहट ये सभी दमा के लक्षण हैं। कुछ मरीजों में सांस लेते समय सीटी की आवाज आती है। अस्थमा के कई प्रकार हैं। इनमें एलर्जी और गैर एलर्जी वाला अस्थमा प्रमुख हैं। ध्यान रखने की बात है कि अस्थमा किसी भी उम्र में और किसी को भी हो सकता है। वहीं गंभीर बात यह है कि अस्थमा रोगियों में निमोनिया होने का खतरा अधिक होता है।
ऐसे में क्या करें
जहाँ तक संभव हो गद्दे साफ़ सुथरे रखें . कमरे में कालीन न रखें। बिस्तर साफ-सुथरा रखें गद्दे.और तकिए पर धूल रक्षक खोल चढ़ाएं। चादरों और कंबलों की समय-समय पर सफाई करते रहें। कमरे में किसी तरह का स्प्रे या कीटनाशकों का छिड़काव मरीज की उपस्थिति में न करें। मरीज के कमरे में किसी तरह का धूम्रपान और धुआं नहीं होना चाहिए। दमा के मरीज को स्वच्छ हवा मिलनी चाहिए। वहीं ठंड से बचाव भी जरूरी है । अस्थमा मरीज का आहार संतुलित और पौष्टिक होना चाहिए । जरूरत से अधिक बह भोजन न करे। इसके साथ ही इलाज के लिए दी गई दवा समय पर और नियमित लेते रहना चाहिए। एलर्जी पैदा करने वाले खाद्य पदार्थों से दूर रहना ही बेहतर।
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