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सृजन, सुविधा और नकल की नई संस्कृति

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नारी ही परिवार की खुशी, राष्ट्र का गौरव और सुख की धुरी है -सुनील कुमार महला

– डॉ. सत्यवान सौरभ

कहा जाता है कि हर नई तकनीक अपने साथ सुविधा लेकर आती है, पर कुछ तकनीकें धीरे-धीरे हमारी सोच और आदतों को भी बदल देती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज ऐसे ही मोड़ पर खड़ी है। उसने लिखने की गति बढ़ाई है, उसे आसान और सुलभ बनाया है; पर उसी अनुपात में उसने सृजन के अर्थ को धुंधला भी किया है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि “लिखा कितना अच्छा है”, बल्कि यह बन गया है कि “लिखा किसने है और किस तरह लिखा है।”

जब किसी लेख, कविता या विचार को पढ़ते हुए यह बोध होता है कि वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा रचा गया है, तो पाठक के भीतर कुछ टूट-सा जाता है। शब्द सधे हुए होते हैं, भाव भी उपयुक्त लगते हैं, पर कहीं एक रिक्तता रह जाती है। जैसे सुंदर शरीर हो, पर उसमें प्राण न हों। रचना का वह जादू, जो लेखक और पाठक के बीच एक अदृश्य संबंध बनाता है, अचानक समाप्त हो जाता है। यह केवल सौंदर्य का नहीं, विश्वास का भी प्रश्न है।

समस्या यह नहीं है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लिख सकती है। समस्या यह है कि वह लिखते समय मनुष्य होने का भ्रम रचती है। वह अनुभव की नकल करती है, पीड़ा की भाषा बोलती है, प्रेम और करुणा के मुहावरे दोहराती है—बिना कभी असफलता, भय या दुविधा से गुज़रे। जब ऐसी सामग्री किसी मनुष्य के नाम से प्रस्तुत की जाती है, तो वह तकनीकी सहायता नहीं रह जाती; वह बौद्धिक नकल का रूप ले लेती है।

यह नकल कोई नई बात नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से इस मानसिकता को पोषित करती रही है कि अंक सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, प्रक्रिया नहीं। परीक्षा में नकल करके उत्तीर्ण होना, दूसरों की उत्तर पुस्तिकाओं से विचार उठाना, और फिर उसी सफलता का गर्वपूर्वक प्रदर्शन—यह सब समाज में किसी न किसी रूप में स्वीकार्य रहा है। आज वही प्रवृत्ति कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से नई शक्ल में सामने आई है। अंतर केवल इतना है कि अब नकल अधिक चमकदार, अधिक विश्वसनीय और अधिक सुरक्षित दिखाई देती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न सामग्री की एक पहचान बन चुकी है—भाषा की दृष्टि से निर्दोष, संरचना में संतुलित, और भावनात्मक रूप से “उचित”। पर यही परिपूर्णता उसे संदिग्ध भी बनाती है। क्योंकि वास्तविक सृजन प्रायः परिपूर्ण नहीं होता। उसमें झिझक होती है, दोहराव होता है, कभी-कभी असंगति भी होती है। सच्चा लेखक अपने ही विचारों से जूझता है, अपनी ही सीमाओं से संघर्ष करता है। उस संघर्ष की छाया शब्दों में दिखाई देती है, और वही रचना को जीवंत बनाती है।

आज सामाजिक माध्यमों और अंकीय मंचों पर सामग्री की बाढ़ है। हर विषय पर, हर दृष्टिकोण से, तुरंत लेख उपलब्ध हैं। इस भीड़ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक तीव्र यंत्र की तरह काम करती है, जो पहले से मौजूद हज़ारों विचारों को जोड़कर एक नया पैकेज बना देती है। यह पैकेज उपयोगी हो सकता है, जानकारीपूर्ण हो सकता है, पर क्या वह दृष्टि दे सकता है? क्या वह जोखिम उठा सकता है? क्या वह यह स्वीकार कर सकता है कि “मैं गलत भी हो सकता हूँ”?

यहीं मनुष्य और यंत्र के बीच मूल अंतर स्पष्ट होता है। मनुष्य अपनी बात कहते समय डरता है—आलोचना से, अस्वीकार से, असफलता से। और यही डर उसकी आवाज़ को विशिष्ट बनाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को न आलोचना का भय है, न अस्वीकार का। इसलिए वह सुरक्षित भाषा में लिखती है—सबको स्वीकार्य, किसी को असुविधाजनक न लगे ऐसी। परिणामस्वरूप, हम ऐसी रचनाएँ पढ़ रहे हैं जो सब कुछ कहती हैं, पर वास्तव में कुछ भी नहीं कहतीं।

एक और गंभीर प्रश्न श्रेय का है। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक औज़ार की तरह उपयोग किया जाए—शोध, संपादन या भाषा-सुधार के लिए—और यह स्पष्ट कर दिया जाए कि इसमें यंत्र की सहायता ली गई है, तो यह ईमानदारी है। पर जब पूरी रचना यंत्र द्वारा तैयार की जाए और लेखक का नाम किसी मनुष्य का हो, तो यह धोखा है। यह पाठक के साथ भी अन्याय है और सृजन की परंपरा के साथ भी।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “अंतिम परिणाम ही महत्त्वपूर्ण है, तरीका नहीं।” पर यही तर्क नकल को भी वैध ठहराता है। यदि तरीका अप्रासंगिक होता, तो शिक्षा, प्रशिक्षण और अभ्यास का कोई अर्थ न रह जाता। सृजन केवल परिणाम नहीं है, वह एक प्रक्रिया भी है। लिखते समय जो सोच विकसित होती है, जो आत्मसंघर्ष होता है, वही लेखक को गढ़ता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उस प्रक्रिया को बीच में ही काट देती है।

यह कहना भी आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वयं में शत्रु नहीं है। हर तकनीक की तरह उसका मूल्य उसके उपयोग में निहित है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब सुविधा, सृजन का स्थान लेने लगती है। जब लेखक बनने के स्थान पर “सामग्री उत्पादक” बनने की होड़ लग जाती है। जब पहचान मेहनत और अनुभव से नहीं, बल्कि उत्पादन की मात्रा से तय होने लगती है।

भविष्य में संभवतः दो प्रकार के लेखन स्पष्ट रूप से दिखेंगे। एक, जो तेज़ होगा, चमकदार होगा, हर जगह उपलब्ध होगा—और शीघ्र भुला दिया जाएगा। दूसरा, जो धीमा होगा, सीमित होगा, कभी-कभी असुविधाजनक भी होगा—पर टिकेगा। क्योंकि वह किसी मनुष्य द्वारा चुकाई गई कीमत के साथ लिखा गया होगा।

पाठक भी धीरे-धीरे इस अंतर को समझने लगेंगे। वे केवल यह नहीं पूछेंगे कि “क्या कहा गया”, बल्कि यह भी पूछेंगे कि “किस कीमत पर कहा गया।” रचना की विश्वसनीयता उसके स्रोत से जुड़ जाएगी। लेखक का मूल्य उसके साहस से आँका जाएगा—उस साहस से, जिसे किसी यंत्र से उधार नहीं लिया जा सकता।

अंततः प्रश्न कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं, हमारी ईमानदारी का है। हम क्या बनना चाहते हैं—सुविधा के उपभोक्ता या अनुभव के सृजनकर्ता? क्या हम अपने नाम के साथ यंत्र की आवाज़ जोड़ना चाहते हैं, या अपनी अधूरी, असुविधाजनक, मानवीय आवाज़ को बचाए रखना चाहते हैं?

सृजन सदैव कठिन रहा है और रहेगा। जो उसे अत्यधिक आसान बना देता है, वह अक्सर उसे खोखला भी कर देता है। इसलिए आज, इस तकनीकी कोलाहल के बीच, सबसे आवश्यक प्रतिरोध यही है कि हम लिखते समय यह स्मरण रखें—शब्द केवल जोड़ने के लिए नहीं होते, जीने के लिए होते हैं। और जीवन की सच्ची अनुभूति की नकल कोई भी यंत्र, चाहे वह कितना ही कुशल क्यों न हो, पूर्ण रूप से नहीं कर सकता।

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