डॉ विजय गर्ग
पुरुषों में उम्र के साथ हार्मोनल परिवर्तन होते हैं,जिन्हें एंड्रोपॉज कहा जाता है। करीब 40 साल के बाद यह धीरे-धीरे विकसित होने वाली जैविक प्रक्रिया है, जिसमें टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम होने लगता है। इससे शारीिरक ऊर्जा, मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास व मांसपेशियों की मजबूती पर असर पड़ता है। इसलिए एंड्रोपॉज को समझना अत्यंत आवश्यक है। एंड्रोपॉज के इलाज के लिए दवाएं जरूरी नहीं, कई बार जीवनशैली में बदलाव ही पर्याप्त होते हैं।
अक्सर यह माना जाता है कि हार्मोनल बदलाव केवल महिलाओं के जीवन से जुड़े होते हैं, विशेषकर मेनोपॉज के संदर्भ में। लेकिन यह धारणा अधूरी है। पुरुषों के जीवन में भी उम्र के साथ हार्मोनल परिवर्तन होते हैं, जिन्हें चिकित्सकीय भाषा में ‘एंड्रोपॉज’ कहा जाता है। यह कोई अचानक होने वाली अवस्था नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होने वाली जैविक प्रक्रिया है, जिसमें पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम होने लगता है। टेस्टोस्टेरोन न केवल पुरुषों की यौन क्षमता, बल्कि उनकी ऊर्जा, मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास, मांसपेशियों की मजबूती और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसलिए एंड्रोपॉज को समझना आज के समय में अत्यंत आवश्यक हो गया है, खासकर तब जब पुरुषों की औसत आयु बढ़ रही है और जीवनशैली लगातार बदल रही है।
स्वाभाविक लेकिन अनदेखा परिवर्तन
एंड्रोपॉज को पुरुषों का ‘मिडलाइफ हार्मोनल ट्रांजिशन’ कहा जा सकता है। आमतौर पर यह 40 वर्ष की आयु के बाद शुरू हो सकता है, हालांकि इसके लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग समय पर और अलग तीव्रता के साथ दिखाई देते हैं। इस अवस्था में टेस्टोस्टेरोन का स्तर हर साल लगभग एक प्रतिशत की दर से कम होने लगता है। यह गिरावट अचानक नहीं होती, इसलिए कई पुरुष इसे सामान्य थकान, काम का दबाव या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन जब ये बदलाव लंबे समय तक बने रहते हैं, तब वे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
हार्मोनल बदलाव के जैविक कारण
उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कई ग्रंथियों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन मुख्य रूप से वृषण यानी टेस्टिस में होता है, और उम्र के साथ उनकी सक्रियता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसके अलावा पिट्यूटरी ग्रंथि, जो हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वह भी उतनी प्रभावी नहीं रह जाती। आधुनिक जीवनशैली, जैसे शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव, शराब का सेवन और असंतुलित आहार, इस प्राकृतिक प्रक्रिया को और तेज कर देते हैं। मोटापा भी टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम करने में भूमिका निभाता है।
शारीरिक लक्षण
एंड्रोपॉज के सबसे पहले दिखने वाले लक्षण शारीरिक स्तर पर महसूस होते हैं। पुरुषों को लगातार थकान महसूस होना, मांसपेशियों की ताकत में कमी, शरीर में चर्बी बढ़ना, विशेषकर पेट के आसपास, और हड्डियों की मजबूती कम होना आम समस्याएं हैं। कई पुरुषों को नींद से जुड़ी परेशानियां भी होती हैं, जैसे देर से नींद आना या बार-बार नींद टूटना। इसके साथ ही इरेक्टाइल डिसफंक्शन व यौन इच्छा में कमी भी देखी जा सकती है।
मानसिक और भावनात्मक प्रभाव
हार्मोनल बदलाव मन और भावनाओं पर भी गहरा असर डालते हैं। एंड्रोपॉज से गुजर रहे पुरुषों में चिड़चिड़ापन, उदासी, आत्मविश्वास में कमी और कभी-कभी अवसाद के लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होने लगती है। कुछ पुरुषों को लगता है कि वे पहले जैसे सक्षम नहीं रहे, जिससे उनके आत्मसम्मान पर चोट पहुंचती है। यह मानसिक दबाव कार्यस्थल और पारिवारिक जीवन दोनों में तनाव का कारण बन सकता है।
सामाजिक व पारिवारिक जीवन पर असर
जब पुरुष शारीरिक और मानसिक रूप से असंतुलित महसूस करने लगते हैं, तो इसका प्रभाव उनके सामाजिक और पारिवारिक संबंधों पर भी पड़ता है। वैवाहिक जीवन में संवाद की कमी, भावनात्मक दूरी और असंतोष जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार पुरुष अपने अनुभवों को साझा नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कमजोरी का संकेत होता है। यह चुप्पी रिश्तों में गलतफहमियों को भी जन्म दे सकती है। परिवार और समाज का सहयोग इस चरण में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
एंड्रोपॉज और जीवनशैली का संबंध
यह समझना जरूरी है कि एंड्रोपॉज की तीव्रता जीवनशैली पर काफी हद तक निर्भर करती है। जो पुरुष नियमित व्यायाम करते हैं, संतुलित आहार लेते हैं और तनाव को नियंत्रित रखना जानते हैं, उनमें इसके लक्षण अपेक्षाकृत हल्के होते हैं। प्रोटीन, विटामिन डी, जिंक और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर आहार टेस्टोस्टेरोन के स्तर को संतुलित रखने में मदद करता है। इसके विपरीत, बैठे रहने वाली जीवनशैली और जंक फूड का अधिक सेवन हार्मोनल असंतुलन को बढ़ा सकता है।
चिकित्सकीय जांच और निदान
एंड्रोपॉज का निदान केवल लक्षणों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। रक्त जांच के माध्यम से टेस्टोस्टेरोन के स्तर को मापा जा सकता है। इसके साथ ही डॉक्टर व्यक्ति की उम्र, जीवनशैली, मानसिक स्थिति और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को भी ध्यान में रखते हैं। सही समय पर जांच कराने से न केवल समस्या की पहचान होती है, बल्कि भविष्य में होने वाली जटिलताओं को भी रोका जा सकता है, जैसे हृदय रोग, मधुमेह और ऑस्टियोपोरोसिस।
उपचार और प्रबंधन के विकल्प
एंड्रोपॉज का इलाज हमेशा दवाओं से ही हो, यह जरूरी नहीं है। कई मामलों में जीवनशैली में बदलाव ही पर्याप्त होते हैं। नियमित व्यायाम, विशेषकर वेट ट्रेनिंग और योग, हार्मोनल संतुलन में मदद करते हैं। तनाव कम करने के लिए ध्यान और प्राणायाम उपयोगी साबित हो सकते हैं। गंभीर मामलों में डॉक्टर टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी की सलाह दे सकते हैं, लेकिन यह केवल विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाना चाहिए।
जागरूकता और स्वीकार्यता
एंड्रोपॉज से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती है इसकी सामाजिक स्वीकार्यता की कमी। पुरुषों को यह समझने की जरूरत है कि यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का एक स्वाभाविक चरण है। जैसे महिलाएं मेनोपॉज के बारे में खुलकर बात करने लगी हैं, वैसे ही पुरुषों को भी अपने हार्मोनल स्वास्थ्य पर संवाद करना चाहिए। जागरूकता बढ़ाने से न केवल समय पर उपचार संभव होगा, बल्कि मानसिक बोझ भी कम होगा। एंड्रोपॉज पुरुष जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। सही जानकारी, समय पर जांच, सकारात्मक जीवनशैली और सामाजिक समर्थन के माध्यम से इस चरण को सहज और स्वस्थ बनाया जा सकता है। हार्मोनल बदलाव को समझकर और स्वीकार करके पुरुष न केवल अपने शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी बनाए रख सकते हैं।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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