केरल के स्कूलों में ‘वाटर बेल’ नाम से एक सराहनीय पहल शुरू की गई है। इस व्यवस्था के तहत पूरे स्कूल समय में दिन में तीन बार ऐसी घंटी बजाई जाती है, जो न तो कक्षा बदलने, न घर जाने और न ही भोजन अवकाश की सूचना देती है, बल्कि बच्चों को पानी पीने की याद दिलाने के लिए होती है। इसके लिए पांच मिनट का समय निर्धारित किया गया है। सामूहिक रूप से पानी पीना बच्चों के लिए एक खेल जैसा बन गया है, जिससे यह आदत उन्हें बोझ नहीं, बल्कि आनंददायक लगने लगी है। यह पहल बच्चों को डिहाइड्रेशन से बचाने के साथ-साथ एक स्वस्थ जीवनशैली की ओर प्रेरित कर रही है।
बच्चों में पर्याप्त पानी न पीने के पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्हें समय पर पानी पीने की याद नहीं रहती। घर में माता- पिता या अन्य सदस्य मौखिक रूप से पानी पीने की याद दिलाते रहते हैं, किंतु बच्चे दिन के सात से आठ घंटे या उससे अधिक समय स्कूल में बिताते हैं । ऐसे
में यदि पानी की कमी हो जाए तो इसका सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे थकान, एकाग्रता में कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। पढ़ाई के साथ-साथ खेल, व्यायाम और अन्य शारीरिक गतिविधियों के कारण बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इन्हीं समस्याओं से निपटने के लिए केरल में वाटर बेल की अवधारणा को लागू किया गया। हालिया शोध बताते हैं कि पानी का सेवन सीधे मस्तिष्क के कार्य पर प्रभाव डालता है, क्योंकि मस्तिष्क के कुल द्रव्यमान का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पानी होता है अनुमान के अनुसार, चार से आठ वर्ष के बच्चों को प्रतिदिन लगभग 1.2 लीटर, नौ से 13 वर्ष के बच्चों को 1.5 लीटर, और 14 वर्ष या उससे अधिक आयु के बच्चों
को 1.9 लीटर या उससे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। हालांकि यह मात्रा मौसम, पसीने और शारीरिक गतिविधियों के अनुसार घट-बढ़ सकती है।
जर्मनी में पांच और छह वर्ष के बच्चों पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि जिन बच्चों ने सुबह उठने के चार घंटे के भीतर दिनभर के पानी का लगभग 50 प्रतिशत सेवन कर लिया था, उनका मस्तिष्क अन्य बच्चों की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर रहा था। विशेषज्ञों के अनुसार, पानी हार्मोन संतुलन बनाए रखने, रक्त प्रवाह को सुचारु रखने तथा मस्तिष्क तक विटामिन, खनिज और आक्सीजन पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे बच्चों की एकाग्रता और सीखने की क्षमता बढ़ती है। ऐसे में केरल के स्कूलों में लागू वाटर बेल योजना स्वस्थ बच्चों के निर्माण की दिशा में एक अत्यंत प्रभावी कदम है। यदि सभी स्कूल इस प्रकार के नवाचार अपनाएं, तो न केवल बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि बचपन में विकसित हुई ये अच्छी आदतें जीवन भर उनके साथ रहेंगी।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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