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Lucknow junction

न्याय की मजबूत बुनियाद से ही सशक्त लोकतंत्र

News-Desk by News-Desk
April 28, 2025
in देश
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न्याय की मजबूत बुनियाद से ही सशक्त लोकतंत्र

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न्याय की मजबूत बुनियाद से ही सशक्त लोकतंत्र

 किसी भी शासन-तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है। यदि समाज में न्याय ही सुनिश्चित न हो, तो लोकतंत्र, संविधान, और विकास के सारे दावे खोखले प्रतीत होते हैं। भारत न्याय रिपोर्ट 2025 ने देश की न्यायिक व्यवस्था की जो तस्वीर पेश की है, वह चौंकाने वाली है। यह रिपोर्ट चार स्तंभों, पुलिस, जेल, न्यायपालिका और कानूनी सहायता के प्रदर्शन के आधार पर राज्यों का आकलन करती है। रिपोर्ट बताती है कि आम भारतीय नागरिक को न्याय पाने के लिए आज भी लंबी, कठिन और कई बार अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

देश में मानवाधिकारों की स्थिति चिंताजनक बनती जा रही है। यह केवल अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों का कथन नहीं, बल्कि आंकड़ों से पुष्ट सच्चाई है। जेलों की हालत इतनी दयनीय है कि कई राज्यों की जेलों में 150 प्रतिशत से भी अधिक की कैदियों की भीड़ है। इनमें से अधिकतर कैदी विचाराधीन हैं, यानी उन्हें किसी अदालत ने दोषी सिद्ध नहीं किया, फिर भी वे वर्षों से कारावास में हैं। यह स्थिति केवल कानून की विफलता नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी उल्लंघन है।

पुलिस, जो न्याय प्रक्रिया की पहली कड़ी होती है, वह खुद जवाबदेही और पारदर्शिता के संकट से जूझ रही है। रिपोर्ट बताती है कि कई राज्यों में पुलिस बल के 25-30 प्रतिशत तक पद खाली हैं। प्रशिक्षण की कमी, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और अत्यधिक कार्यभार के चलते पुलिसकर्मी थके हुए। वे कभी-कभी हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के प्रति पुलिस का रवैया अब भी कठोर और कई बार पक्षपातपूर्ण पाया गया है।

जेलों में कैदियों की भीड़ और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी के कारण जेलें सुधार गृह नहीं, बल्कि मानवाधिकार हनन के केंद्र बन गई हैं। मानसिक रूप से बीमार कैदी, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे अधिक पीड़ित हैं। मनोरोग विशेषज्ञों और परामर्शदाताओं की अनुपस्थिति, अत्यधिक गर्मी-सर्दी में राहत की व्यवस्था का अभाव और कानूनी सलाह की पहुंच न होना, इस स्थिति को और भी गंभीर बना देता है।

न्यायपालिका की स्थिति भी बेहतर नहीं कही जा सकती। करोड़ों मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। रिपोर्ट बताती है कि उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में जजों के लगभग 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं। एक सामान्य नागरिक को अपना मुकदमा निपटाने में 10-15 वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है। ‘विलंबित न्याय, अन्याय होता है’ यह कहावत अब भारत में कड़वी सच्चाई बन गई है। ई-कोर्ट्स और तकनीक आधारित समाधान का प्रसार अभी तक केवल कुछ मेट्रो शहरों तक सीमित है, जबकि दूरदराज के क्षेत्रों में लोग आज भी कागज और रजिस्टरों पर आधारित व्यवस्था से जूझ रहे हैं।

यदि सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की बात की जाए, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ का नाम विशेष रूप से सामने आता है। उत्तर प्रदेश में जेलों की अत्यधिक भीड़, पुलिस पर जवाबदेही की कमी, हिरासत में मौतें और लाखों लंबित मामले न्याय व्यवस्था की विसंगति को उजागर करते हैं। बिहार में प्रति लाख जनसंख्या पर जजों की संख्या सबसे कम है और कानूनी सहायता लगभग अनुपस्थित है। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आदिवासी क्षेत्रों में फर्जी गिरफ्तारियां, पुलिस हिंसा और जेलों में वर्षों तक विचाराधीन कैदियों की उपस्थिति एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।

इनके विपरीत, कुछ राज्य ऐसे भी हैं जिन्होंने न्यायिक व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। इन राज्यों में पुलिस बल अपेक्षाकृत प्रशिक्षित और बहुभाषायी हैं, जजों की नियुक्ति समय पर होती है, कानूनी सहायता का ढांचा सक्रिय है और जेलों में भीड़ नियंत्रण में है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो न्याय व्यवस्था को सुधारा जा सकता है।

उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य को बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए था, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि यहां भी न्यायिक ढांचे में कई कमियां हैं। पुलिस बल में 20 प्रतिशत रिक्तियां हैं, महिला पुलिस की भागीदारी बेहद कम है और जेलों में 120 प्रतिशत से अधिक कैदियों की भीड़ है। उच्च न्यायालय और जिला न्यायालयों में जजों के लगभग 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं। सीमांत और पर्वतीय जिलों जैसे चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में न तो प्रभावी कानूनी सहायता है और न ही नियमित न्यायिक सेवाएं।

यह रिपोर्ट महज आंकड़ों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है। यह हमें स्मरण कराती है कि यदि न्याय की नींव कमजोर होगी, तो लोकतंत्र की इमारत कभी टिक नहीं सकती। केवल चुनाव, योजनाएं और विकास के आंकड़े पर्याप्त नहीं, जब तक कि समाज का हर वर्ग न्याय तक सहज, सुरक्षित और सुलभ पहुंच न पाए।

विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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