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उपलब्धियों के शोर में दबे सच: 2025 का आत्ममंथन

News-Desk by News-Desk
December 30, 2025
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बीता साल, बचे सवाल: 2025 का भारत

– डॉ सत्यवान सौरभ

इतिहास केवल तारीख़ों और घटनाओं का संग्रह नहीं होता, वह समाज की सामूहिक चेतना का आईना भी होता है। बीते कुछ वर्ष, और विशेष रूप से वर्ष 2025, भारत के लिए ऐसा ही एक आईना बनकर सामने आए—जिसमें हमने अपनी उपलब्धियाँ भी देखीं और अपनी असहज सच्चाइयाँ भी। यह वर्ष उम्मीद और हताशा, प्रगति और पिछड़ेपन, गर्व और ग्लानि—इन सभी भावों का एक साथ साक्षी बना।

2025 में भारत ने कई मोर्चों पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। डिजिटल भुगतान प्रणाली ने आम नागरिक के जीवन को अपेक्षाकृत सरल बनाया। यूपीआई जैसी तकनीकों ने यह दिखाया कि यदि नीयत हो तो तकनीक जनसाधारण तक पहुँच सकती है। स्टार्टअप संस्कृति ने युवाओं में उद्यमिता का विश्वास जगाया, अंतरिक्ष अनुसंधान में भारत ने सीमित संसाधनों में असाधारण क्षमताओं का परिचय दिया, और बुनियादी ढाँचे—सड़कों, रेल, हवाई अड्डों—के विस्तार ने ‘तेज़ी से बढ़ते भारत’ की छवि को मज़बूत किया। इन उपलब्धियों से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यहीं आत्ममंथन की ज़रूरत भी पैदा होती है, क्योंकि सवाल केवल विकास का नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव का है।

विकास के चमकदार आँकड़ों के समानांतर 2025 में बेरोज़गारी और महंगाई की सच्चाई भी उतनी ही तीखी रही। पढ़े-लिखे युवाओं के हाथों में डिग्रियाँ थीं, लेकिन रोज़गार नहीं। भर्ती परीक्षाओं की अनिश्चितता, परिणामों में देरी और निजी क्षेत्र की अस्थिरता ने एक पूरी पीढ़ी को मानसिक दबाव में डाल दिया। महंगाई ने आम आदमी की रसोई से संतुलन छीन लिया। दाल-सब्ज़ी, गैस, शिक्षा और स्वास्थ्य—सब कुछ महँगा होता गया, पर आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। यह आर्थिक असंतुलन धीरे-धीरे सामाजिक असंतोष में बदलता चला गया।

2025 में किसान और मज़दूर की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं रही। मौसम की मार, फसल के उचित दाम न मिलना, बढ़ता कर्ज़ और नीति-स्तर की अनदेखी ने किसान को लगातार असुरक्षा में रखा। कहीं संवाद टलता रहा, कहीं आंदोलनों को दबाने की कोशिश हुई। यह विडंबना है कि जो देश को भोजन देता है, वही सबसे अधिक अनिश्चित भविष्य से घिरा है। मज़दूरों की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं रही। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग सामाजिक सुरक्षा, स्थायी रोज़गार और सम्मानजनक जीवन से वंचित रहे। विकास की इमारत जिन हाथों से खड़ी होती है, वे हाथ अक्सर सबसे ज़्यादा थके और सबसे कम सुरक्षित होते हैं।

सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जर हालत 2025 में और अधिक उजागर हुई। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली अब किसी एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। शिक्षक संसाधनों की कमी और प्रशासनिक दबाव के बीच काम करते रहे, वहीं स्वास्थ्यकर्मी अत्यधिक कार्यभार, सीमित सुविधाओं और असुरक्षा के वातावरण में अपनी ज़िम्मेदारी निभाते रहे। निजीकरण ने विकल्प तो दिए, लेकिन समानता नहीं। शिक्षा और स्वास्थ्य धीरे-धीरे अधिकार की जगह बाज़ार की वस्तु बनते चले गए, और इसका सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को हुआ जो पहले से ही सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर थे।

लोकतंत्र की दृष्टि से भी 2025 एक बेचैन करने वाला वर्ष रहा। असहमति को देशविरोध से जोड़ने की प्रवृत्ति ने सार्वजनिक विमर्श को संकुचित किया। लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर बढ़ता दबाव यह संकेत देने लगा कि सत्ता से सवाल पूछना जोखिम भरा होता जा रहा है। सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर गिरफ्तारियाँ, अभिव्यक्ति की सीमाएँ तय करने की कोशिशें और संवैधानिक संस्थानों की स्वायत्तता पर उठते प्रश्न यह याद दिलाते रहे कि लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया से जीवित नहीं रहता। वह जीवित रहता है स्वतंत्र प्रेस, निर्भीक नागरिकों और जवाबदेह संस्थानों से।

धर्म और पहचान की राजनीति ने 2025 में समाज को बार-बार विभाजित किया। धार्मिक उन्माद, भीड़तंत्र की मानसिकता और नैतिक पुलिसिंग ने संविधान में निहित समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता के मूल विचारों को चुनौती दी। धर्म, जो व्यक्ति का निजी आस्था-क्षेत्र होना चाहिए था, वह सत्ता और राजनीति का औज़ार बनता चला गया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में अविश्वास बढ़ा, संवाद टूटा और मानवीय रिश्तों में दरारें गहराती चली गईं।

इन तमाम निराशाजनक स्थितियों के बीच 2025 ने उम्मीद की कुछ ठोस झलकें भी दीं। युवाओं ने सवाल पूछे, छात्रों ने अपनी आवाज़ बुलंद की, किसानों और कर्मचारियों ने संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग की। नागरिक संगठनों और स्वतंत्र पत्रकारिता ने यह साबित किया कि भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह मौन नहीं हुआ है। यह प्रतिरोध केवल सत्ता के विरुद्ध नहीं था, बल्कि उस सामाजिक उदासीनता के विरुद्ध भी था जो धीरे-धीरे हमें भीतर से खोखला कर देती है।

2025 ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास को केवल जीडीपी के आँकड़ों से नहीं मापा जा सकता। जब तक गाँव सुरक्षित नहीं होंगे, किसान आश्वस्त नहीं होगा, मज़दूर सम्मान के साथ नहीं जिएगा, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी संरक्षित नहीं होंगे, और छात्र भविष्य को लेकर भयमुक्त नहीं होंगे, तब तक ‘विकसित भारत’ केवल एक आकर्षक नारा ही बना रहेगा। तकनीक तभी सार्थक है जब वह मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी हो, और शासन तभी सफल माना जा सकता है जब उसका प्रभाव अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचे।

बीते वर्षों, और विशेषकर 2025 की सबसे बड़ी सीख यही है कि भारत को बचाने की ज़िम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी है। लोकतंत्र में चुप्पी तटस्थता नहीं होती; वह अक्सर अन्याय की सबसे मज़बूत सहयोगी बन जाती है। जब हम अन्याय देखकर चुप रहते हैं, तब हम अनजाने में उसके पक्ष में खड़े हो जाते हैं। 2025 ने हमें यह एहसास कराया कि अब चुप रहना विकल्प नहीं रहा। सवाल करना, असहमति जताना और संवाद बनाए रखना ही आज का सबसे बड़ा देशप्रेम है।

2025 केवल एक बीता हुआ वर्ष नहीं है, बल्कि एक चेतावनी और एक अवसर दोनों है। चेतावनी इस बात की कि यदि हमने असमानता, असहिष्णुता और दमन को सामान्य मान लिया, तो लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा। और अवसर इस बात का कि हम विकास की दिशा, राजनीति की भाषा और नागरिक भूमिका—तीनों पर गंभीर पुनर्विचार कर सकते हैं। यदि 2025 से हमने सच में कुछ सीखा है, तो वही सीख आने वाले वर्षों को अधिक मानवीय, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक लोकतांत्रिक बना सकती है।

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