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खामोश अपराध के खिलाफ आवाज़: मानव तस्करी जागरूकता दिवस

News-Desk by News-Desk
January 11, 2026
in देश
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विकसित भारत के सारथी: प्रवासी भारतीय और 2047 का संकल्प




-सुनील कुमार महला 

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11 जनवरी को राष्ट्रीय मानव तस्करी विरोधी दिवस  (नेशनल एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग डे) या राष्ट्रीय मानव तस्करी जागरूकता दिवस मनाया जाता है, जैसा कि मानव तस्करी आज दुनिया भर में एक गंभीर व बड़ी समस्या बनकर उभरी है।यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि तस्करी का मतलब सिर्फ और सिर्फ परिवहन से नहीं है। वास्तव में यह एक बहुत बड़ा भ्रम है कि तस्करी का मतलब व्यक्ति को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना है। असल में, तस्करी का मुख्य आधार शोषण है; पीड़ित अपने ही घर या शहर में भी तस्करी का शिकार हो सकता है। उल्लेखनीय है कि मानव तस्करी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है (नशीली दवाओं के बाद), जिससे हर साल लगभग 150 डॉलर बिलियन का अवैध लाभ कमाया जाता है। हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास और उत्पत्ति या शुरूआत की बात करें तो इस दिवस की आधिकारिक शुरुआत वर्ष 2007 में अमेरिका में हुई थी,जब अमेरिकी सीनेट ने 11 जनवरी को राष्ट्रीय मानव तस्करी जागरूकता दिवस के रूप में नामित करने का एक प्रस्ताव पारित किया था। संयुक्त राज्य अमेरिका में इसे ‘राष्ट्रीय मानव तस्करी जागरूकता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, वर्ष 2010 में, राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पूरे जनवरी को ‘राष्ट्रीय दासता एवं मानव तस्करी रोकथाम माह’ घोषित किया था, जिसके तहत यह दिवस जागरूकता फैलाने का कार्य करता है। हालांकि, इस दिवस को मनाने की शुरुआत अमेरिका से हुई थी, लेकिन आज यह एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है।संयुक्त राष्ट्र द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार, किसी व्यक्ति को डराकर, बलपूर्वक या दोषपूर्ण तरीके से कोई कार्य करवाना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने या बंधक बनाकर रखने जैसे कृत्य तस्करी की श्रेणी में आते हैं। पाठकों को बताता चलूं कि 11 जनवरी को अक्सर ‘वियर ब्लू डे’ के रूप में भी मनाया जाता है, जिसमें लोग नीले रंग के कपड़े पहनकर पीड़ितों के साथ एकजुटता दिखाते हैं। यहां गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र 30 जुलाई को ‘मानव तस्करी के विरुद्ध विश्व दिवस’ मनाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो संयुक्त राष्ट्र ने 30 जुलाई को ‘मानव तस्करी के विरुद्ध विश्व दिवस’ (वर्ल्ड डे अगेंस्ट ट्रैफिकिंग इन पर्सन्स) घोषित किया है, जो वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करता है।मानव तस्करी के पीछे कारणों की यदि हम यहां पर बात करें तो इसके पीछे प्रमुख कारण क्रमशः गरीबी और अशिक्षा, बंधुआ मज़दूरी, देह व्यापार, सामाजिक असमानता, क्षेत्रीय लैंगिक असंतुलन, बेहतर जीवन की लालसा है। सामाजिक सुरक्षा की चिंता, महानगरों में घरेलू कामों के लिये लड़कियों की तस्करी तथा चाइल्ड पोर्नोग्राफी के लिये बच्चों की तस्करी भी मानव तस्करी के प्रमुख कारण हैं। हाल फिलहाल, क्या यह बहुत ही गंभीर और संवेदनशील नहीं है कि आज महिलाएँ और लड़कियाँ मानव तस्करी से सर्वाधिक पीड़ित हैं और इनमें से अधिकांश की तस्करी यौन शोषण के लिये की जाती है।वास्तव में, यह एक ऐसा अपराध है जिसमें लोगों को उनके शोषण के लिये खरीदा और बेचा जाता है। पाठकों को बताता चलूं कि मानव तस्करी को रोकने के क्रम में यह दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य मानव तस्करी जैसी गंभीर सामाजिक बुराई के प्रति आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना, पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करना तथा इस अपराध के विरुद्ध समाज, पीड़ितों के पुनर्वास के उपायों पर ध्यान केंद्रित करना तथा प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को मानव तस्करी के खिलाफ एकजुट करना है।सरल शब्दों में कहें तो यह दिवस मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) के खिलाफ चेतना और जनजागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। आज मानव तस्करी करके बच्चों को  जबरन श्रम, यौन शोषण, बाल श्रम में धकेल दिया जाता है,जो बहुत ही दुखद है। पाठकों को बताता चलूं कि मानव तस्करी में लोगों को धोखे, बल, या जबरन तरीके से किसी अन्य स्थान पर ले जाकर जबर्दस्ती श्रम, यौन शोषण, अंगों की तस्करी या अन्य अनैतिक कामों के लिए मजबूर किया जाता है। बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि यह दिवस मानव तस्करी जैसे अपराध के गंभीर प्रभावों के बारे में लोगों को सचेत या जागरूक करता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि नेशनल ह्यूमन ट्रैफिकिंग अवेयरनेस डे की शुरुआत संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी, जहां 11 जनवरी को ‘नेशनल स्लेवरी एंड ह्यूमन ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन मंथ’ के रूप में इसे घोषित किया गया था और इसके बाद यह दिवस हर साल 11 जनवरी को मानव तस्करी के खिलाफ जागरूकता के रूप में विश्वभर में मनाया जाने लगा। हमारे देश में भी इस दिवस को जागरूकता दिवस के रूप में मनाया जाकर इस दिन अनेक सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक कार्यक्रम (सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा) आयोजित किये जाते हैं। वैश्विक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो आज  दुनिया भर में लगभग 30 मिलियन लोग आधुनिक गुलामी/मानव तस्करी की शिकार हैं। भारत से सम्बंधित आंकड़ों की यदि हम यहां पर बात करें तो हमारे देश में साल 2018–2022 के दौरान लगभग 10,655 मानव तस्करी मामले दर्ज किए गए थे। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत में लगभग 6,036 पीड़ितों की पहचान हुई, जिनमें से 2,878 बच्चे शामिल थे।इनमें 1,059 लड़कियाँ थीं, जो बाल तस्करी का हिस्सा थी।एक अन्य उपलब्ध जानकारी के अनुसार बिहार में पिछले छह महीनों में 100 से अधिक लड़कियों के लापता होने के मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचे हैं, जो मानव तस्करी गिरोह की संभावित सक्रियता को दर्शाते हैं।इसी प्रकार से आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर झारखंड से आए 12 बच्चों को संभावित मानव तस्करी से बचाया गया था। भारत में स्थिति की बात करें तो ‘ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2023’ के अनुसार, भारत में लगभग 1.1 करोड़ लोग आधुनिक गुलामी की स्थितियों में रह रहे हैं। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, तस्करी के मामलों में जबरन श्रम और यौन शोषण सबसे प्रमुख कारण हैं।एक अन्य उपलब्ध जानकारी के अनुसार दुनिया भर में लगभग 5 करोड़ लोग आधुनिक गुलामी के शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, तस्करी के हर 4 पीड़ितों में से 1 बच्चा होता है। गौरतलब है कि ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2025 के अनुसार दुनिया भर में आधुनिक दासता (मॉडर्न स्लेवरी) एक गंभीर वैश्विक समस्या बनी हुई है। इस इंडेक्स को वॉक फ्री फाउंडेशन द्वारा तैयार किया जाता है, जिसमें जबरन श्रम, मानव तस्करी, ऋण-बंधन, जबरन विवाह और यौन शोषण जैसे शोषण के रूपों को शामिल किया जाता है। 2025 के विश्लेषण में अनुमान है कि विश्व में लगभग 5 करोड़ (50 मिलियन) लोग किसी न किसी रूप में आधुनिक दासता का शिकार हैं। इसमें सबसे अधिक दर उत्तर कोरिया, इरीट्रिया और मॉरिटानिया जैसे देशों में दर्ज की गई है, जबकि दक्षिण सूडान और सोमालिया जैसे देश सबसे अधिक जोखिम वाले देशों में शामिल हैं। भारत की बात करें तो जनसंख्या अधिक होने के कारण हमारे यहां जबरन श्रम, ऋण-बंधुआ मजदूरी और मानव तस्करी के मामले देखने को मिलते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह इंडेक्स सरकारों की नीतियों, कानूनों और पीड़ितों के संरक्षण प्रयासों का भी मूल्यांकन करता है और वैश्विक स्तर पर मानव तस्करी व आधुनिक दासता के खिलाफ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर देता है। बहरहाल, यह भी एक कड़वा तथ्य है कि तस्करी में पहचाने गए पीड़ितों में से लगभग 70% महिलाएं और लड़कियां होती हैं। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2025 के लिए इस दिवस की थीम-‘कड़ियों को जोड़ना, समुदायों को मजबूत करना, तस्करी को रोकना’ रखी गई थी। वास्तव में यह थीम इस बात पर जोर देती है कि मानव तस्करी को केवल कानून से नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के सहयोग और जागरूकता से ही खत्म किया जा सकता है। वहीं पर इस साल यानी कि वर्ष 2026 के लिए ह्यूमन ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन मंथ (जनवरी) की थीम-‘स्ट्रोंगर कनेक्शन्स,स्ट्रोंगर फ्यूचर्स’ यानी कि-‘ज्यादा मजबूत सम्बन्ध, बेहतर भविष्य।’वास्तव में,इसका फोकस इस बात पर है कि घर, समुदाय और कार्यस्थल में मजबूत सम्बन्ध तस्करी के जोखिम को कम करने में कैसे मदद करते हैं। यहां पाठकों को यह भी जानकारी देता चलूं कि मानव तस्करी के विरुद्ध विश्व दिवस 30 जुलाई 2025 के लिए इस अंतरराष्ट्रीय दिवस की थीम ‘मानव तस्करी एक संगठित अपराध है – शोषण समाप्त करें’ (ह्यूमन ट्रैफिकिंग इज आर्गेनाइज्ड क्राइम-ऐंड द एक्सप्लोइटेशन) रखी गई थी। अंत में यही कहूंगा कि हमारे देश में में मानव तस्करी को रोकने के लिए सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं। अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (आइटीपीए), बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, पोस्को अधिनियम तथा भारतीय न्याय संहिता में मानव तस्करी से जुड़े कठोर प्रावधान लागू किए गए हैं। केंद्र सरकार ने एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) की स्थापना कर राज्यों में विशेष जांच और बचाव तंत्र को मजबूत किया है। इसके साथ ही उज्ज्वला योजना के तहत पीड़ितों के पुनर्वास, संरक्षण और कौशल विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। ट्रैकचाइल्ड पोर्टल, 1098 चाइल्डलाइन, और अंतर-राज्यीय व अंतरराष्ट्रीय समन्वय के माध्यम से गुमशुदा बच्चों की पहचान व त्वरित बचाव सुनिश्चित किया जाता है। जागरूकता अभियानों, एनजीओ की भागीदारी और डिजिटल निगरानी के माध्यम से भारत मानव तस्करी की रोकथाम की दिशा में निरंतर प्रयासरत है। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23–24 मानव तस्करी और जबरन श्रम को रोकते हैं तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 (1) और अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत भारत में मानव तस्करी प्रतिबंधित है।आपराधिक कानूनों (आइपीसी धारा 370 और 370ए) के अंतर्गत मानव तस्करी को कड़े दंड के साथ दंडनीय अपराध माना गया है।मानव तस्करी को रोका जा सकता है। वास्तव में आज मानव तस्करी को रोकने के लिए कानूनी, सामाजिक और जागरूकता आधारित प्रयासों की आवश्यकता है।कड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन और दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए।गरीबी, बेरोज़गारी और अशिक्षा को कम कर लोगों को सुरक्षित आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना बहुत ही जरूरी व आवश्यक है। जन-जागरूकता अभियान, खासकर महिलाओं और बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति सजग बनाते हैं। सरकार, पुलिस, स्वयंसेवी संगठन और समाज के सहयोग से ही मानव तस्करी पर प्रभावी रोक संभव है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड। मोबाइल 9828108858

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