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Lucknow junction

नारी ही परिवार की खुशी, राष्ट्र का गौरव और सुख की धुरी है -सुनील कुमार महला

News-Desk by News-Desk
February 16, 2026
in देश
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विकसित भारत के सारथी: प्रवासी भारतीय और 2047 का संकल्प




स्त्री की गरिमा और उसका सम्मान भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा रहे हैं। हमारे यहां नारी को शक्ति, करुणा और सृजन का प्रतीक माना गया है तथा शास्त्रों में कहा गया है-‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।’ यहां पाठकों को बताता चलूं कि यह प्रसिद्ध संस्कृत वचन ‘मनुस्मृति’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है कि जहां नारी का सम्मान और आदर होता है, वहां देवताओं का वास होता है। वास्तव में, यह कथन भारतीय संस्कृति में स्त्री के उच्च और पूजनीय स्थान को दर्शाता है। नारी को शक्ति, करुणा, त्याग और सृजन की प्रतीक माना गया है।सच तो यह है कि परिवार और समाज की असली आधारशिला नारी ही होती है और जिस समाज में महिलाओं को समान अधिकार, शिक्षा और सुरक्षा मिलती है, वह समाज और देश प्रगति और समृद्धि की ओर अग्रसर होता है। इसके विपरीत, जहां नारी का अपमान होता है, वहां अशांति और पतन का वातावरण बनता है। इसलिए नारी सम्मान केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक आवश्यकता भी है।इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू और अहिल्याबाई होल्कर जैसी महान महिलाओं ने साहस, नेतृत्व और त्याग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। परिवार और समाज के निर्माण में स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है; वह मां, बहन, पत्नी और बेटी के रूप में जीवन को संवेदना, संतुलन और संस्कार प्रदान करती है। आज के आधुनिक युग में महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, खेल और प्रशासन सहित हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। इसलिए आवश्यक है कि स्त्री का सम्मान केवल परंपरा या शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार, सोच और सामाजिक व्यवस्था में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे, तभी हमारा समाज सच्चे अर्थों में उन्नत और सभ्य बन सकेगा। बहरहाल, स्त्रियों की गरिमा व सम्मान के क्रम में हाल ही में जैस्मीन सैंडलस ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान एक बड़ा और साहसी कदम उठाया। जब कुछ लोग वहां मौजूद लड़कियों और महिलाओं को परेशान कर रहे थे, तो उन्होंने गाना बीच में ही रोक दिया। बहरहाल,यहां पाठकों को बताता चलूं कि जैस्मीन सैंडलस एक प्रसिद्ध भारतीय-अमेरिकी पंजाबी गायिका और गीतकार हैं, जिन्होंने अपने अलग अंदाज़ और दमदार आवाज़ से संगीत जगत में खास पहचान बनाई है। उनका जन्म 4 सितंबर 1985 को पंजाब के जालंधर में हुआ और बाद में वह अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में पली-बढ़ीं। उन्होंने 2007 में अपने करियर की शुरुआत की और पंजाबी म्यूज़िक इंडस्ट्री में तेजी से लोकप्रिय हुईं। बॉलीवुड में उन्हें बड़ी पहचान फिल्म ‘किक’ के गीत ‘यार ना मिले’  से मिली। उनके गानों में पॉप, आर एंड बी और पंजाबी फोक का मिश्रण देखने को मिलता है। जैस्मीन न सिर्फ गायिका हैं बल्कि अपने कई गीत स्वयं लिखती भी हैं, और अपनी बेबाक शैली व ऊर्जावान स्टेज परफ़ॉर्मेंस के लिए जानी जाती हैं।जैस्मीन सैंडलस ने संगीत कार्यक्रम के दौरान यह बात साफतौर पर कहीं कि जब तक महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी, वह मंच पर नहीं गाएंगी। वास्तव में,यह घटना बताती है कि आज भी सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं को अभद्र व्यवहार का सामना करना पड़ता है। घर से बाहर निकलते ही उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता रहती है। दुख की बात यह है कि ऐसे मामलों में कई लोग सब कुछ देखकर भी चुप रहते हैं।आज आए दिन मीडिया की सुर्खियों में यह खबरें हमें पढ़ने को मिलतीं रहतीं हैं कि विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं को आज अभद्र टिप्पणियों, घूरने, छेड़छाड़ और उत्पीड़न जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बस, ट्रेन, बाजार, दफ्तर या यहां तक कि शैक्षणिक संस्थानों के आसपास भी वे असुरक्षा की भावना से घिरी रहती हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि घर से बाहर कदम रखते ही उन्हें अपने कपड़ों, समय और रास्तों तक के बारे में सोच-समझकर निर्णय लेना पड़ता है। वास्तव में,यह स्थिति केवल कानून व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की समस्या भी है। जब तक महिलाओं के प्रति सम्मान, समानता और संवेदनशीलता की भावना समाज में मजबूत नहीं होगी, तब तक केवल सख्त कानून भी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाएंगे। परिवार, विद्यालय और समाज सभी को मिलकर ऐसी मानसिकता विकसित करनी होगी, जिसमें महिला को स्वतंत्र और सुरक्षित नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाए। वास्तव में, सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाना सरकार, प्रशासन और हम सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है। सीसीटीवी, हेल्पलाइन, त्वरित कार्रवाई जैसे उपाय जरूरी हैं, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है जागरूकता और जिम्मेदार व्यवहार। जब महिलाएं बिना भय के स्वतंत्र रूप से बाहर निकल सकेंगी, तभी समाज वास्तव में प्रगतिशील कहलाएगा। हाल फिलहाल, जैस्मीन सैंडलस का यह कदम सिर्फ एक कार्यक्रम रोकना नहीं था, बल्कि महिलाओं के सम्मान और आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना था। उन्होंने यह संदेश दिया कि किसी भी हालत में महिलाओं के साथ बदसलूकी बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। कहना ग़लत नहीं होगा कि उनका यह साहस पूरे समाज के लिए एक सीख है। अंत में यही कहूंगा कि, जैसा कि हमारी संस्कृति में कहा गया है कि -शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।न शोचन्ति च यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।’ तात्पर्य यह है कि जहाँ परिवार की स्त्रियाँ दुखी रहती हैं, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है, और जहाँ वे प्रसन्न रहती हैं, वह परिवार सदैव उन्नति करता है। वास्तव में नारी ही परिवार की खुशी, राष्ट्र का गौरव और सुख की धुरी है, इसलिए उन्हें सदैव सम्मान मिलना चाहिए।

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सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड। मोबाइल 9828108858

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